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VASTUSHASTRI

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  • दो दिवसीय राष्ट्रीय से

    दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार,ग्वालियर में

    विषय--भारतीय संस्कृति,शिक्षा,स्- वास्थ्य एवं पर्यावरण पर

    ---पत्रकार,संस्कृत के जानकर,आयुर्वेद के ज्ञाता,सन-महात्मा,- िजियो थेरेपी वाले,एवं इस प्रकार की विधा से जुड़े अन्य सभी महानुभाव भी सादर आमंत्रित हें...

    --यह एक पूर्णतया निशुल्क प्रोग्राम/कार्यक्- म हें....किन्तु पंजीयन आवशयक हें...

    दिनांक--31 अगस्त एवं एक सितम्बर,2013 (शनिवार-रविवार)

    स्थान---महावीर जेन धर्मशाला,नयी सड़क,( यादव सिनेमा के पास),
    ग्वालियर (मध्यप्रदेश)

    विशेष ध्यान देवें---
    --अपना पंजीयन शीघ्र करावा लेवें ...
    ----भाग लेने वालों को आवास,भोजन,भ्रमण,यो- ाभ्यास,प्रदर्शनी की निशुल्क व्यवस्था हें..
    -----सभी प्रतिभागियों को बेग ,डायरी ,पेन ,सम्मानपत्र, भी दिया जायेगा...
    -------------------------------------------
    संपर्क करें---
    01 .----मुख्य राष्ट्रीय संयोजक----
    डाक्टर श्री महेश चन्द्र चंद्रवंशी,
    वैशाली नर्सिंग होम,मोदी स्टील फेक्ट्री के सामने,
    मोदी नगर,गाज़ियाबाद (उत्तरप्रदेश ) पिन कोड--201204
    मोब.---09456254689
    ----------------------------------------------
    02 .----मुख्य राष्ट्रीय संयोजक----
    वेध्य राज गंगाधर द्विवेदी(आचार्य),
    प्रधान संपादक---आयुर्वेद धन्वन्तरि मासिक पत्रिक,
    धन्वन्तरी आश्रम ,
    मुकाम--मुंगराबादशा- हपुर,
    जिला--जोनपुर (उत्तरप्रदेश) पिनकोड--222203
    मोब.--09415495505 एवं 09648301918 , फोन नंबर---05454 --274607
    --------------------------------------------------- -----------------------
    03 .----स्थानीय संयोजक/स्वागताध्य- ्ष ----
    श्री राजेन्द्र जेन,संपादक,(भोपाल),
    मोब.-09827234537 ....एवं 07828545991
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    04 .----मुख्य स्थानीय संयोजक----
    डाक्टर मधुरानी सिंह राठोर,
    संपादक-जन प्रवाह समाचार पात्र,
    ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
    मोब..09833516930

  • वास्तु निर्माण से सम्ब

    केसे जाने की वास्तु दोष हें ग्रंथों/शास्त्रों के अनुसार----

    (वास्तु निर्माण से सम्बंधित शास्त्रीय नियम)----

    सामान्यतया मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं।

    भारतीय भवन निर्माण कला की अद्वितीय परंपरा को सारे विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है. भारतीय भवन निर्माण कला स्वयं में कला, विज्ञान तथा आध्यात्म का एक ऐसा अभूतपूर्व तथा विलक्षण संगम है जिसके समकक्ष शिल्प कला विश्व के किसी भी भाग में नही पायी जाती. हमारे भवनों में जहां एक ओर रहने की सुविधाजनक व्यवस्थाओं का चिंतन किया गया है वहीं दूसरी ओर गृहस्थ जीवन पर ज्योतिष, तंत्र तथा दैवीय शक्तियों के प्रतीकात्मक तथा व्यावहारिक प्रभाव का लाभदायक प्रभाव प्राप्त करने के निमित्त वास्तु शास्त्र नामक एक पूरा विधान भी गढा गया तथा उसके अनुसार भवनों को ज्यादा उपयोगी तथा गृहस्थ जीवन को पूर्णता प्रदान करने में सहयोगी बनाने का भी प्रयास किया गया.

    प्राचीन एवम सर्वमान्य संहिता व वास्तु ग्रंथो में प्रतिपादित कुछ शास्त्रीय वास्तु नियमों का उल्लेख किया जाता है | वास्तु निर्माण में इनका प्रयोग करने पर वास्तु व्यक्ति के लिए सब प्रकार से शुभ ,समृद्धि कारक एवम मंगलदायक होता है |आजकल के तथाकथित वास्तु शास्त्रियों द्वारा जनसाधारण को व्यर्थ के बहम में डालने वाले तथा अपने ही गढे हुए नियमों पचडे में न पड़ कर केवल इन्हीं शास्त्रीय नियमों का पालन करने पर वास्तु सब प्रकार से शुभ होता है।

    आज हम पुनः भवन निर्माण के प्राचीन नियमों अर्थात वास्तु को मान्यता दे रहे हैं. कई भव्य भवन जो वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार नही थे बल्कि विख्यात आर्किटेक्टों के निर्देशन में बने थे उनको तोडकर वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाने पर वहां रहने वालों को अत्यंत ही सुखद परिणाम प्राप्त हुए. जिसने आज वास्तु को भवन निर्माण के लिए एक अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत कर दिया है. एक ऐसा शास्त्र जो हमारी अन्य पारंपरिक विधाओं की ही तरह अपने महत्व को प्रमाणित करने में समर्थ हो रहा है.
    एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है।
    यथा :-- भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है।

    हमारे ग्रंथों में लिखा भी हें की----
    वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
    वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम -- "समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश"

    वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम। सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है।
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    ज्योतिष विद्या एक विशाल समुन्द्र है संस्कृत में ज्योतिष का अभिप्राय उस प्रकाश से है। जो हमें ज्ञान देता है। अंग्रेजी भाषा में उसे आस्ट्रोलोजि कहते है। ''आस्ट्रो'' का अर्थ ''तारे'' और ''लोगोस'' का अर्थ ''तर्क'' होता है। अत: ज्योतिष विद्या का अर्थ है एक विशिष्ट समय तक राशि चक्र में ग्रहों और नक्षत्रों की गति का तर्क संगत प्रभाव ज्ञात करना (बारह भावों का फल)।
    यह उचित कहा गया है कि वास्तु शास्त्रा कला एवं विज्ञान का सम्मिश्रण है। जिसमें रहस्यमयी या अलौकिक विज्ञान के अतिरिक्त शिल्प विद्या अभियान्त्रिकी अन्त: एवं वाह्य सञ्जाए पर्यावरण व अरगोंनोमिक्स, खगोलविद्या व ज्योतिष-शास्त्रा भी सम्मलित है। इसका मुख्य प्रयत्न मानव प्रकृति व भवनों में मानव जाति के उद्दार हेतु सन्तुलन व सामन्जस्य स्थापित करना है।

    कहा गया हें की-----
    अभिगर्हितो संक्रमितो त्याज्यमावासम खल्वशुभेक्षितो यत.
    वृषम यातः उत्खलितो एकदा न पुनरागमनो भवति.
    यदि आदमी अपना तथा अपने परिवार का सुख एवं अभ्युदय चाहता हो तों उस आवास में रहना ठीक उसी प्रकार त्याग दे जैसे एक बार वृषोत्सर्ग हो जाने के बाद फिर उस वृष को वापस घर नहीं लाया जाता. यह कथन देवर्षि नारद का है जिन्होंने देवल ऋषि को वास्तु के सिद्धांतो क़ी शिक्षा दे ते हुए बताया था.
    ज्योतिष के दो अंग है :- सिळान्त तथा फलित।
    सिळान्त के अन्तर्गत विभिन्न दार्शनिक विचार या ज्योतिषशास्त्र के नियम आते है जबकि फलित के निम्नलिखित पाँच मुख्य भाग है। (1) जातक (2) ताजिक (3) मुहूत्र्त (4) प्रशान (5) संहिता।

    मुहूत्र्त ज्योतिष के ही एक पक्ष के ''वास्तु के प्रकरण'' के नाम से जानते है।

    घर बनाना हो तो पहले गन्ध वर्ण रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र यानी भूमि की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थान में मिट्टी मधु शहद के समान गन्ध हो तो ब्राहमणों के लिये फ़ूल जैसी गन्ध हो तो क्षत्रियों के लिये खटाई जैसी गन्ध हो तो वैश्यों के लिये और मांस जैसी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्र जाति के लिये मान्य होता है। वहां की मिट्टी का रंग सफ़ेद हो तो ब्राहमणों के लिये,लाल हो तो क्षत्रियों के लिये और पीली हो तो वैश्य के लिये और काली हो तो शूद्र के निवास के लिये उपयुक्त मानी जाती है,यदि वहां की मिट्टी का स्वाद मीठा हो तो ब्राहमणो के लिये और कडुआ यानी मिर्च की भांति चरपरी लगे तो क्षत्रियों के लिये,खटीली हो तो वैश्यों के लिये और कसैला स्वाद हो तो शूद्रों के लिये ठीक मानी गयी है। ईशान पूर्व और उत्तर दिशा सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देने वाली मानी गयी है। अन्य दिशाओं में नीची भूमि सबके लिये हानिकारक होती है।

    सर्व प्रथम यह ज्ञान करने हेतु कि व्यक्ति विशेष के भाग्य में जमीन, मकान, भवन इत्यादि सम्पतियाँ हैं और यदि ऐसा है तो कब कहाँ और कैसे वह उनको प्राप्त करेगा। और वे कितने बड़े या छोटे होगें।
    दूसरी बात यह ज्ञात करने हेतु कि प्लाट या भूमि खरीदने के लिये निर्माण प्रारम्भ करने के लिये मुख्य नीवं का पाया ज्ञात करना प्रवेश द्वार व दरवाजा निश्चित करने हेतु और अन्त में ''गृह-प्रवेश'' हेतु कार्यालय, कारखाना, छविग्रह, होटल, पाठशाला या महाविद्यालय इत्यादि के उद्घाटन हेतु कौन सा समय अत्यधिक शुभ है। ताकि मालिकों और निवासियों चाहे वे वहाँ रहे या कर्मचारियों के रुप में काम करें या यहाँ तक कि यात्रा, दृष्टा, विद्यार्थी या ग्राहक ही हो, हेतु सभी प्रकार की उन्नति, खुशहाली व शान्ति सुनिश्चित की जा सके।

    हम किसी भी जातक की जन्मपत्राी से ज्ञात कर सकते है कि जातक के भू-सम्पदा का योग है तथा भवन-निमार्ण कर ''भवन-सुख'' है तो उस समय यह भी विचार करना चाहिये कि भवन हेतु भूमि कौन से नगर तथा नगर का कौन सा भाग अनुकूल है। क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये नगर या मौहल्ला भवन-निर्माण हेतु उपयुक्त नहीं होता है तथा उपयुक्त दिशा का भी चयन कर लेना चाहिये। क्यों कि अनुकूल दिशा वाले भाग मे निर्मित भवन सभी प्रकार से शुभ सूचक होता है।

    अब प्रश्न आता है कि भवन क्रय या निर्माण का कार्य किस नाम राशि से करना चाहिये। देश, ग्राम, गृह, युळ, नौकरी, व्यापार वमुकदमे में बोलते नाम राशि का प्रयोग करना चाहिये। जन्मराशि का प्रयोग यात्रा, ग्रह-गोचर एवं शुभ कार्यो मे करना चाहिये। किसी व्यक्ति के कई नाम हो तो पुकारने पर वह जिस नाम से सोता हुआ जाग जाय उसको प्रयोग मे लाना चाहिये।

    व्यक्ति की नाम राशि से नगर या मौहल्ला की नाम राशि 2, 5, 9, 10 व 11 वीं हो तो शुभ। 1, 7 हो तो शत्रु। 4, 8 व 12 हो तो रोग। 3, 6 हो तो रोग कारक समझना चाहिये नगर शुभ न होतो जिस मौहल्ले में गृह निमार्ण करना हो वह शुभ होना चाहिये। यदि नगर व मौहल्ला शुभ होतो सर्वोत्तम है।
    यदि व्यक्ति की नाम राशि से नगर या हमौहल्ले की नाम राशि 1, 3, 4, 6, 7, 8 व 12 वीं हो तो पहली राशि में होने पर इसका फल शत्रु, तीसरी राशि में होने पर हानि, चौथी राशि में होने पर रोग, छठी राशि में होने पर हानि, सातवीं राशि में होने पर शत्राु, आंठवी राशि में होने पर रोग और बारहवीं राशि में होने पर भी रोग होता है।
    उक्त विचार करने पर यदि नगर व मौहल्ला शुभ एवं सर्वोत्तम है। तो यदि प्लाट पूर्व मुखी है तो श्रेष्ठ और यदि प्लाट के पूर्व व उत्तर में सड़क है तो सर्वश्रेष्ठ यदि उत्तरी मुखी है तो भी श्रेष्ठ, यदि पश्चिम मुखी है तो सामान्य और यदि दक्षिण मुखी है तो नेष्ठ होता है। जो अनेक समस्याओं और कष्ठ देने वाला होता है। प्लाट को क्रय करते समय शूल अथवा सड़क बीथी नहीं होनी चाहिये। क्यों कि सड़क-शूल दुर्घटना तथा अन्य बाधाओं का कारक होता है।

    नगर व मौहल्ला शुभ व अशुभ देखने के लिये निम्न सारिणि है। जिससे आशानी पूर्वक देखा जा सकता है।
    उक्त सारिणी से आसानी पूर्वक शहर या नगर या मौहल्ला का शुभ अशुभ का विचार करके यदि शुभ होतो भवन निर्माण करना चाहिये यदि अशुभ हो तो विचार नहीं करना चाहिये। यदि भाग्य से व्यक्ति को शुभ शहर, शुभ कालौनी (मौहल्ला) शुभ मुख का प्लाट मिलता हो तो व्यक्ति के अवश्य भवन बना कर रहना चाहिये, इससे व्यक्ति का चहुमुखी विकास होता है। और अपने जीवन का सभी प्रकार का आनन्द लेकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है। व्यक्ति के इसके विपरीत तथ्यों की ओर अग्रसर नहीं होना चाहिये। क्यों कि जीवन केा कष्टमय और संघर्ष पूर्ण बनाना औचित्य पूर्ण नहीं है।
    नगर या मौहल्ला (कालौनी) चयन कर लेने के बाद यह निर्णय करना चाहिये कि उसका (नगर या मौहल्ला) किस दिशा का भाग अनुकूल है। यह भी नाम राशि से ज्ञात कर सकते है।

    शुभाशुभ-दिशा ज्ञान चक्र-----
    vastu.jpg
    उक्त सारिणी के आधार पर अभिप्राय: यह है कि मेष राशि वाले उत्तर दिशा में, मिथुन, सिंह, व मकर राशि वाले मध्य भाग में कर्क राशि वाले नैऋत्य भाग में कन्या राशि वाले पूर्व भाग में, धनु राशि वाले पश्चिम भाग, कुम्भ राशि वाले ईशान भाग में और मीन राशि वाले केा अग्नि भाग में नहीं रहना चाहिये। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओं में रहना चाहिये। क्यों कि वे दिशायें उनके लिये सुख-आराम के लिये शुभ एवं लाभप्रद रहेगी।

    किसी भी जातक की जन्म पत्रिाका से उसके भवन के शुभ व अशुभ का ज्ञान हम कर सकते हे। लग्न पूर्व दिशा है जिसमें शुभ ग्रह का होना लाभप्रद होता है। द्वितीय भाव और तृतीय भाव ईशान कोण है जिनमें गुरु व चन्द्रमा का होना बहुत शुभ होता है। चतुर्थ भाव उत्तर दिशा है जिसमें शुभ ग्रहों का होना लाभ प्रद होता है। पं'चम व षष्ढ भाव वायव्य कोण है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्राधिपति का होना शुभ एवं लाभप्रद हैं सप्तम भाव पश्चिम दिशा है जिसमें पाप ग्रह व पाप राशि का होना अशुभ है। क्यों कि सप्तम भाव या सप्तमेश मारकेश होता है। अष्टम व नवम भाव नैऋत्य कोण है। जिसमें शनि होना शुभ है। क्यों कि अष्टम दुर्घटना व आयु तथा रहस्यमयी विद्याओं का स्थान है। अष्टमस्य शनि दीर्घ आयु प्रदान करता है। दशम भाव दक्षिण - दिशा है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्रपति व त्रिाकोणपति का बैढना शुभ होता है। एकादश भाव और द्वादश भाव अग्निकोण है। जिसमें ग्रहों का न होना अच्छा होता है। यदि उक्त दिशाओं में पाप ग्रह, नीच ग्रह या पाप ग्रहों की दृष्टियाँ होती है तो उस जातक के मकान मे उस भाग में कोई न कोई दोष अज्ञानवश या परिस्थितिवश बन जाता है जिसके फलस्वरुप वह जीवन भर कष्ट पाता है। यदि किसी सुयोग्य वास्तुकार को मकान का अवलोकन करा दिया जाय तो उस दोष का निवारण हो सकता है। निवारण का योग उस जातक की शुभ ग्रह की दशा व अन्तर दशा तथा प्रत्यान्तर दशा में बनता है। इसलिये जातक को उस योग का लाभ, प्रयास करके प्राप्त कर लेना चाहिये अन्यथा पश्चाताप बना रहता है।
    वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य 'इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है।
    नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-

    अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः
    आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह।
    अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन - धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है।
    प्रायः आज कल लोग बिल्डरों द्वारा बनायी कालोनियों में बने बनाए घरो में निवास प्रारम्भ कर देते है. जिसके पीछे वास्तु के सूक्ष्म नियमो क़ी अनदेखी कर अपनी आर्थिक एवं समय क़ी बचत के बारे में ही बिल्डर ज्यादा सोचते है.
    परिणाम यह निकलता है कि कुछ ही दिनों बाद वहां रहने वाला व्यक्ति विविध कठिनाईयों एवं उपद्रवो का शिकार होने लगता है.पहले तों अपनी अति आधुनिक बुद्धि का सहारा लेता है. तथा “पोंगा पंथी” एवं “पौराणिक मान्यताओं” को धता बताने का भरसक प्रयास करता है. और अंत में जब चारो तरफ से थक जाता है तों अंत में वास्तु के नियमो क़ी खोज करने लगता है. अस्तु, जो भी हो, यहाँ कुछ प्रमुख दोषों एवं उनका परिहार को जानने का प्रयास करते हें-----
    उपार्तिक दोष.-----
    यदि भवन में आपाती किरणों का क्षेत्र समूचे घर के आयतन के अनुपात में 3:1 से कम है. तों उपार्तिक दोष लगता है. इसके परिणाम स्वरुप घर में से लक्ष्मी का निवास समाप्त होता चला जाता है. धीरे धीरे आदमी क़र्ज़ में डूब जाता है. न चाहते हुए भी पैसा हाथ से निकलता चला जाता है. और आदमी बिल्कुल ही थक जाता है. उपार्तिक दोष में आपाती किरणें मंगल क़ी अभिजात किरणों से परावर्तित होकर घर में प्रवेश करती है. किन्तु इसका उपद्रव तब और विशेष रूप से बढ़ जाता है जब शुक्र के साथ मंगल क़ी किरणों का किसी भी तरह से सम्बन्ध बन जाय. इसके निवारण का एक ही उपाय है कि यदि घर के उसी कोण पर फर्श से ढाई हाथ ऊपर दीपरखा का निर्माण कर आधानीकरण स्थापित कर दें. किन्तु इस उपाय का भी प्रभाव तब नहीं हो पायेगा यदि गृह प्रवेश किसी क्षिप्र या अंधनक्षत्र में हुआ होगा. या गृह स्वामी का जन्म नक्षत्र क्षिप्र या अंध नक्षत्र हो.
    विभ्राण दोष- ----
    यदि भवन में सजातीय दीवारें परस्पर चौडाई में संलग्न वामावर्ती द्वार से पश्चिम या दक्षिण हो तों विभ्राण दोष होता है. ऐसी अवस्था में संबंधियों से बिलगाव, बेटे बेटी क़ी शादी में दिक्कतें, तथा जगह जगह अपमान प्राप्त होता है. यह इसलिये होता है क्योंकि उपादेयी एवं प्राक्षिक किरणों के संचलन का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है. अर्थात गुरु एवं बुध षडाष्टक दोष बनाते है. इसके लिये पूर्वाषाढा, मूल, रेवती या धनिष्ठा नक्षत्रो में जब बुधवार पड़े तब गृह स्वामी अपने हाथ से एक हाथ लंबा चौड़ा सफ़ेद पत्थर का कितनी भी मोटाई का टुकड़ा लेकर उस पर मूल मन्त्र उद्धृत करवा ले. फिर उसे जागृत कर सुन्दर तरीके से उस वामावर्ती दीवार में चिनवा दे जिसके कारण यह दोष उत्पन्न हुआ हो. इसे अच्छी तरह से सजा कर रखे. इस प्रकार इस दोष का तों निवारण होता ही है, इसके अलावा इससे सुख समृद्धि भी बढ़ती है. यह एक अनुभूत प्रयोग है.
    अनुलोम दोष-----
    यदि भवन में मुख्य द्वार से अन्दर ठीक सामने कोई द्वार हो. सामने का तात्पर्य यह है कि अन्दर क़ी तरफ वाली दीवार का पहला दरवाज़ा हो तथा दरवाजे से समकोण बनाते हुए कोई भी घुमाव किसी अन्य द्वार में जाने का न बनता हो तों अनुलोम दोष बनता है. इसके अशुभ प्रभाव से पैत्रिक संपदा का नाश एवं पुत्रियों का या लड़कियों का जीवन वैधव्य में गुजरता है. इसका सबसे बड़ा दोष यह होता है कि घर से मान मर्यादा एवं आचार विचार सब धीरे धीरे समाप्त हो जाता है. धन संपदा रहने के बावजूद भी दुःख या विक्षोभ के कारण आत्म ह्त्या जैसे जघन्य कुकृत्य भी होते है. इसके निवारण का जो उपाय बताया गया है वह थोड़ा टेढा एवं कठिन है. नदी से स्वयं निकाले पांच सेर रेत, एक छटाक कच्चा कपूर एवं आधा सेर शहद को एक में गूंथ लें. या बाज़ार से बना बनाया शार्निक शिव लिंग खरीद ले. किन्तु स्वयं बनाया शिव लिंग भरोसे मंद होता है. घर के उस क्रान्ति विन्दु पर उसे रखे जो दोष पूर्ण है. उसके नीचे सात अन्न को पीस कर बनाया हुआ आता एक सेर बिछा दे. उस शिवलिंग क़ी रेती से जो पानी टपके उसे किसी धातु क़ी थाली में गिरना चाहिए. रेती का निकास अग्नी कोण या उससे सटे दिशाओं में नहीं होना चाहिए. किसी धीरे पाठ करने वाले पण्डित से रुद्राष्टाध्यायी के पांचवें अध्याय के पाठ से उसका अभिषेक करे. उस समय पण्डित एवं एक यजमान के सिवाय कोई न रहे. शेष पंचोपचार क़ी पूजा स्वाभाविक ही है. सब कुछ पुरा हो जाने के बाद शिवलिंग आदि का विसर्जन कर दे. किन्तु जो जल धातु क़ी थाली में एकत्र हुआ है उसे लगातार एक महीने तक नित्य प्रति प्रत्येक कक्ष में थोड़ा थोड़ा छिड़के. जब पुनः वही नक्षत्र आ जाय तों विसौन्जी हवन कर देवे. इससे इस दोष क़ी शान्ति हो जाती है.
    विदाकांत दोष-----
    यह दोष तब उत्पन्न होता है जब घर में नित्य प्रति शरीर के किसी अँग से किसी व्यभिचारित धातु का संपर्क दो व्यंगुल में हो रहा हो. ऐसी स्थिति आज कल ज्यादा आ रही है. छट या फर्श का आरसीसी करते वक्त इतना ध्यान लोग नहीं दे पाते कि चारो तरफ छत में लगी हुई सरिया या छड सीमेंट में समान रूप से ढकी हुई है. कही न कही तों ऐसी परत रह ही जाती है जहां यह परत बिल्कुल नाम मात्र क़ी रह जाती है. और यह दोष भयंकर रूप धारण कर लेता है. इसके कारण मुक़द्दमा, पराजय, व्यापार या व्यवसाय का नाश, नौकरी में पदावनति या नौकरी से निकाला जाना आदि उत्पात सामने आते है. इसके निवारण के लिये चारो कोनो पर खूब बढ़िया सुसज्जित वैखानस यंत्र जो किसी सफ़ेद पत्थर पर स्पष्ट रूप से उकेरा गया हो दीवार में चिनवा दे. उसे ऐसा सजा कर रखे जिससे देखने में वह सुन्दर लगे. चिनावाने से पहले उस यंत्र को जागृत (एक्टिवेट) अवश्य करवा ले. दोष दूर हो जाता है.
    अभिमूलक दोष------
    यह दोष भी आज कल सामान्य हो गया है. प्रायः लोग सुन्दरीकरण में इसकी उपेक्षा कर देते है. यह कई प्रकार से होता है. या तों कोई ऐसा चित्र दीवार में गलत कोण या दिशा में उकेरवा देते है जो उस चित्र के लिये अशुभ हो या फिर घर के अन्दर ही ऐसी मूर्ती स्थापित करवा देते है जिनकी पूजा स्थापना कर के घर में नहीं करनी चाहिए. इसके परिणाम बड़े भयंकर होते है. जवान बेटे या परिवार के किन्ही जवान सदस्यों क़ी मृत्यु, घिनौने चर्म रोग एवं अन्य असाध्य रोगों क़ी उत्पत्ति होती है. कभी कभी तों पूर्ण सामाजिक बहिष्कार का सामना तक करना पड़ जाता है. इसका निवारान करने के लिये घर के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जन्म के नक्षत्र या फिर घर के सबसे छोटे जीवित सदस्य के जन्म नक्षत्र में यौदिक पिंड भर कर उसके ऊपर शहद एवं कपूर के मिश्रण से बनी पांच बत्ती वाला दीपक जला कर पञ्च देवो का आवाहन करे. तथा गूलर, गुम, गुलेथी, गुलाब एवं गुड़हल क़ी डाली से उस पिंड के ऊपर शंकु का निर्माण कर स्वयं के बनाए धुप को प्रज्वलित करते हुए नवार्नव मन्त्र के एक माला पाठ सहित पञ्च देवो क़ी आरती करे. और उसे वही पर यथावत छोड़ दे. अगले दिन भी उसी तरह करते हुए यह काम सत्ताईसवें दिन तक जारी रखे. सत्ताईसवें दिन पूर्णाहुति कर दे. यह दोष शांत हो जाता है.

    ये पांच दोष प्रमुख है. इसके अलावा भी छोटे मोटे शास्त्रीय दोष बताये गये है. किन्तु उनका निवारण नित्य घर में सामान्य पूजा करते रहने से समाप्त हो जाता है. यहाँ यह जानना जरुरी हें की शान्ति विधान अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, अनुराधा, शतभिषा एवं रेवती नक्षत्र में जन्म प्राप्त व्यक्तियों के लिये नहीं है. उन्हें इससे कोई लाभ नहीं होने वाला है. वैसे तों पूजा पाठ का फल महान, अतिविचित्र एवं सर्वसमर्थ होता है. उससे कुछ भी निवृत्त हो जाना असंभव नहीं है. किन्तु विधान में इन्हें निषेध किया गया है.
    (सहायक ग्रन्थ- भाव विभूति, वास्तु रहस्य संग्रह, नारद संहिता, चंडिका विधान एवं श्रीमद्भागवत पुराण आदि)
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    शायद ही कोई ऐसा घर हो जो वास्तु दोष से मुक्त हो। वास्तु दोष का असर कई बार देर से होता है तो कई बार इसका प्रभाव जल्दी दिखने लगता है। इसका कारण यह है कि सभी दिशाएं किसी न किसी ग्रह और देवताओं के प्रभाव में होते हैं। जब ग्रह विशेष की दशा चलती है तब जिस दिशा में वास्तु दोष होता है उस दिशा का अशुभ प्रभाव घर में रहने वाले व्यक्तियों पर दिखने लगता है।
    vaastu_direction.jpg
    दिशाओं के दोष को दूर करने का सबसे आसान तरीका है मंत्र जप।

    आइये जाने की किस दिशा के लिए कोनसा मन्त्र हें लाभकारी----
    ईशान दिशा-----
    इस दिशा के स्वामी बृहस्पति हैं। और देवता हैं भगवान शिव। इस दिशा के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नियमित गुरू मंत्र 'ओम बृं बृहस्पतये नमः' मंत्र का जप करें। शिव पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का 108 बार जप करना भी लाभप्रद होता है।धन लाभ, संतान व शुभ फल देने वाला होता है घर का ये हिस्सा ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा के स्वामी भगवान रुद्र (शिव) तथा प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति हैं। भूखण्ड के ईशान दिशा में मार्ग हो तो भवन ईशानमुखी अर्थात ईशान्यभिमुख होता है। इस प्रकार के भूखण्ड बुद्धिमान संतान तथा शुभ फल देने वाला होता है।
    ईशान मुखी भूखण्ड पर निर्माण करते समय निम्न वास्तु सिद्धांतों का पालन करना चाहिए-
    1- ईशानमुखी भूखण्ड ऐश्वर्य, लाभ, वंश वृद्धि, बुद्धिमान संतान व शुभ फल देने वाला है। ऐसे भूखण्ड पर निर्माण करते समय ध्यान रखें कि ईशान कोण कटा व ढका हुआ न हो। प्रयास करें कि प्रत्येक कक्ष में ईशान कोण न घटे।
    2- ईशानमुखी भवन में ईशान कोण सदैव नीचा रहना चाहिए। ऐसा करने से सुख-सम्पन्नता व ऐश्वर्य लाभ होगा।
    3- ईशान कोण बंद न करें न कोई भारी वस्तु रखें। ईशान मुखी भूखण्ड में आगे का भाग खाली रखें तो शुभ रहेगा।
    4- भवन के चारों ओर की दीवार बनाएं तो ईशान दिशा या पूर्व, उत्तर की ओर ऊंची न रखें।
    5- ईशान के हिस्से को साफ रखें, यहां कूड़ा-कचरा, गंदगी आदि न डालें। झाड़ू भी न रखें।
    6- ईशान मुखी भूखण्ड के सम्मुख नदी, नाला, तालाब, नहर तथा कुआं होना सुख, सम्पत्ति का प्रतीक है।
    7- ईशान कोण में रसोई घर न रखें वरना घर में अशांति, कलह व धन हानि होने की संभावना रहती है। 8- घर का जल ईशान दिशा से बाहर निकालें। फर्श का ढलाव भी ईशान कोण की ओर रखें।
    पूर्व दिशा-----
    घर का पूर्व दिशा वास्तु दोष से पीड़ित है तो इसे दोष मुक्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्य मंत्र 'ओम ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' का जप करें। सूर्य इस दिशा के स्वामी हैं। इस मंत्र के जप से सूर्य के शुभ प्रभावों में वृद्घि होती है। व्यक्ति मान-सम्मान एवं यश प्राप्त करता है। इन्द्र पूर्व दिशा के देवता हैं। प्रतिदिन 108 बार इंद्र मंत्र 'ओम इन्द्राय नमः' का जप करना भी इस दिशा के दोष को दूर कर देता है।
    आग्नेय दिशा-----
    इस दिशा के स्वामी ग्रह शुक्र और देवता अग्नि हैं। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शुक्र अथवा अग्नि के मंत्र का जप लाभप्रद होता है। शुक्र का मंत्र है 'ओम शुं शुक्राय नमः'। अग्नि का मंत्र है 'ओम अग्नेय नमः'। इस दिशा को दोष से मुक्त रखने के लिए इस दिशा में पानी का टैंक, नल, शौचालय अथवा अध्ययन कक्ष नहीं होना चाहिए।
    दक्षिण दिशा------
    इस दिशा के स्वामी ग्रह मंगल और देवता यम हैं। दक्षिण दिशा से वास्तु दोष दूर करने के लिए नियमित 'ओम अं अंगारकाय नमः' मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। यह मंत्र मंगल के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है। 'ओम यमाय नमः' मंत्र से भी इस दिशा का दोष समाप्त हो जाता है।
    नैऋत्य दिशा-----
    इस दिशा के स्वामी राहु ग्रह हैं। घर में यह दिशा दोषपूर्ण हो और कुण्डली में राहु अशुभ बैठा हो तो राहु की दशा व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी हो जाती है। इस दोष को दूर करने के लिए राहु मंत्र 'ओम रां राहवे नमः' मंत्र का जप करें। इससे वास्तु दोष एवं राहु का उपचार भी उपचार हो जाता है।
    पश्चिम दिशा------
    यह शनि की दिशा है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं। इस दिशा में किचन कभी भी नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शनि मंत्र 'ओम शं शनैश्चराय नमः' का नियमित जप करें। यह मंत्र शनि के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है।
    वायव्य दिशा-----
    चन्द्रा इस दिशा के स्वामी ग्रह हैं। यह दिशा दोषपूर्ण होने पर मन चंचल रहता है। घर में रहने वाले लोग सर्दी जुकाम एवं छाती से संबंधित रोग से परेशान होते हैं। इस दिशा के दोष को दूर करने के लिए चन्द्र मंत्र 'ओम चन्द्रमसे नमः' का जप लाभकारी होता है।
    उत्तर दिशा-------
    यह दिशा के देवता धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा बुध ग्रह के प्रभाव में आता है। इस दिशा के दूषित होने पर माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है। आर्थिक कठिनाईयों का भी सामना करना होता है। इस दिशा को वास्तु दोष से मुक्त करने के लिए 'ओम बुधाय नमः या 'ओम कुबेराय नमः' मंत्र का जप करें। आर्थिक समस्याओं में कुबेर मंत्र का जप अधिक लाभकारी होता है।
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    घर के भेद-----
    घर के छ: भेद होते है,इनमें एक शाला,द्विशाला,त्रि- शाला,चतुष्शाला,सप्- तशाला,और दसशाला,इन दसों शालाओं में प्रत्येक के १६ भेद होते है,ध्रुव,धान्य,जय,न- ्द,खर,कान्त,मनोरम,- ुमुख,दिर्मुख,क्रू- ,शत्रुद,स्वर्णद,क्- य,आक्रन्द,विपुल और विजय, नाम के गृहो होते है,चार अक्षरों के प्रस्तार भेद से क्रमश: इन गृहों की गणना करनी चाहिये।
    गृह प्रमाण---
    घर के खम्भे घर के पैर होते है,इसलिये वे संख्या में सम होने उत्तम होते है जैस २,४,६,८, आदि,विषम संख्या में हानिकारक माने जाते है,घर को न तो बहुत ऊंचा ही करना चाहिये और न ही अधिक नीचा,इसीलिये अपनी इच्छा निर्वह के अनुसार भित्ति यानी दीवाल की ऊंचाई करनी चाहिये,घर के ऊपर जो घर दूसरा मंजिल बनाया जाता है,उसमें भी इसी प्रकार का विचार करना चाहिये। घरों की ऊंचाई के आठ प्रमाण कहे गये है,पान्चाल,वैदेह,क- रव,कान्यकुब्ज,माग- ,शूरसेन,गान्धार,और आवन्तिक । जहां घर की ऊंचाई उसकी चौडाई से सवागुनी अधिक होती है,वह घर पान्चाल घर कहलाता है,फ़िर उसी ऊंचाई को लगातार सवागुनी बढाने से वैदेह आदि प्रकार के मकान होते है,इसके अन्दर पान्चाल सर्वसाधारण जनो के लिये शुभ है। ब्राह्मणों के लिये आवन्तिक मान,क्षत्रियों के लिये गान्धारमान,और वैश्यों के लिये कान्यकुब्जमान,इस प्रकार से ब्राह्मणादि वर्णों के लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये,तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये।
    ध्वज और गज आय में सवारी के साधनों का घर बनाना चाहिये,शय्या आसन छाता और द्वजा इन सब के निर्माण के लिये वृष अथवा द्वज आय होने चाहिये।
    वराह मिहिर के अनुसार जिस दिशा में मुख्य द्वार रखना है भूखंड की उस भुजा के बराबर आठ भाग करें ,पूर्वीदिशा में बांयें से तीसरा व चौथा भाग ,दक्षिण दिशा में केवल चौथा भाग ,पश्चिमी दिशा व उत्तरी दिशा में तीसराचौथा -पांचवां भाग मुख्य द्वार के निर्माण के लिए शुभ होता है |घर के सभी द्वार एक सूत्र में होने चाहियें ,ऊपर की मंजिल के द्वारों किउंचाई नीचे के द्वारों से द्वादशांश छोटी होनी चाहिये | गृह के द्वार अपने आप ही खुलते या बंद होते हो तो अशुभ है । गृह क द्वार प्रमाण से अधिक लम्बे हो तोरोग कारक तथा छोटे हो तो धन नाशक होते है । गृह द्वार पर मधु का छत्ता लगे या चौखट, दरवाजा गिर जाये तोगृह पति को कष्ट होता है । घर में चौरस स्तम्भ बनवाना शुभ होता है तथा गोल स्तम्भ बनवाना अशुभ ।
    15 हाथ ऊँचा ,आठ हाथ चौडा उत्तम एवम 13 हाथ ऊँचा सैट हाथ चौडा मध्यम कहा गया है |मुख्य द्वार के सामने कोई वृक्ष ,स्तंभ ,मन्दिर ,दिवार का कोना ,पानी का नल ,नाली ,दूसरे घर का द्वार तथा कीच हो तो वेध करता है |गृह की ऊंचाई से दुगनी दूरी पर वेध हो या गृह राजमार्ग पर स्थित हो तो वेध नहीं होता |

    निवास करने योग्य स्थान की भलीभांति परीक्षा करके उक्त लक्षण युक्त भूमि में दिक्साधन यानी दिशाओं का ज्ञान करना चाहिये,उसके लिये समतल भूमि में एक वृत यानी गोल घेरा बनावे और उसके बीच में द्वादसांगुल शंकु यानी बारह विभाग या पर्व से युक्त बारह अंगुल की लकडी को नाप कर सीधी खडी हुई उस घेरे के बीच में स्थापित करे,और दिक्साधन विधि से दिशाओं का ज्ञान करे,फ़िर कर्ता के नाम यानी जिसके नाम प्लाट या भूमि हो,वह खुद षडवर्ग शुद्ध क्षेत्रफ़ल (वास्तु भूमि की लम्बाई-चौडाई का गुणनफ़ल करे),अभीष्ट लम्बाई चौडाई के बराबर दिशा साधित रेखा के अनुसार चतुर्भुज बनावे,उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्राकार यानी चारदीवारी बनावे,लम्बाई चौडाई में पूर्व आदि चारों दिशाओं में आठ आठ द्वार के भाग होते है,प्रदक्षिण क्रम से उसे इस प्रकार से लिखे,जैसे पूर्व वाली दीवाल के उत्तर से दक्षिण तक-पहला-हानि,दूसरा-- िर्धनता,तीसरा-धन लाभ,चौथा- राजसम्मान,पांचवां बहुत धन,छठा अति चोरी,सातवां अति क्रोध,और आठवां-भय इस प्रकार से लिखे,इसके बाद दक्षिण वाली दीवाल के पूर्व से पश्चिम तक के आठ भाग भी लिखे।
    पूर्व दिशा की दीवाल (उत्तर से दक्षिण)----
    ईशान हानि निर्धनता धनलाभ राजसम्मान बहुतधनलाभ अतिचोरी अतिक्रोध भय अग्नि
    दक्षिण दिशा की दीवाल (पूर्व से पश्चिम)-----
    अग्नि मरण बन्धन भय धनलाभ धनवृद्धि निर्भयता व्याधिभय निर्बलता नैऋत्य
    पश्चिम दिशा की दीवाल (दक्षिण से उत्तर)-----
    नैऋत्य पुत्रहानि शत्रुवृद्धि लक्ष्मीप्राप्ति धनलाभ सौभाग्य अतिदुर्भाग्य दुख शोक वायव्य
    उत्तर दिशा की दीवाल (पश्चिम से पूर्व )----
    वायव्य स्त्रीहानि निर्बलता हानि धान्यलाभ धनागम सम्पत्तिवृद्धि भय रोग ईशान

    इसी प्रकार से पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फ़ल समझने चाहिये,द्वार का जितना विस्तार यानी चौडाई हो,उससी दुगुनी ऊंचाई की किवाडॆं बनाकर घर के दरवाजे पर उपरोक्त फ़लानुसार लगानी चाहिये,दिवाल बनाने के बाद चाहरदीवारी के भीतरी भाग में जितनी भूमि बचती है,उसके इक्यासी खन्ड बनाकर बनावे। उनके बीच के नौ खन्डों में ब्रहमा का स्थान समझे,चाहरदीवारी के साथ सटे हुये जो बत्तीस भाग है,वे पिशाचांश कहलाते है,उनके साथ मिलाकर घर बनाने से दुख शोक और भय देने वाला होता है,शेष बचे अंशों के अन्दर घर बनाया जाये तो पुत्र और पौत्र और धन की वृद्धि देने वाला होता है। (नारद-पुराण श्लोक ५४० से ५५५.१/२,त्रिस्कंध ज्योतिष संहिताप्रकरण)

    वास्तुराज वल्लभ के अनुसार-----

    सिंह-वृश्चिक -मीन राशि वालों के लिए पूर्व दिशा में ,
    कर्क -कन्या -मकर राशि वालों के लिए दक्षिण ,
    मिथुन -तुला -धनु राशि वालों के लिए पश्चिम एवम
    मेष -वृष – कुम्भ राशि वालों के लिएउत्तर दिशा में मुख्य द्वार बनवाना शुभ होता है |

    घर के उद्यान में अशोक, निम्बू ,

  • जानिए कुन्डली विवेचन क

    जानिए कुन्डली विवेचन के सौ तरीके/विधियाँ----

    आज हम ज्योतिष फल कथन के बारे में कुछ वैदिक सेद्धान्तिक बातों पर विचार करते हें..जेसे---

    १. निर्णय करने के लिये शास्त्र की सहायता लेनी चाहिये,और संकेतों के माध्यम से जातक का फ़लकथन कहना चाहिये,ध्यान रखना चाहिये कि नाम और धन आने के बाद आलस का आना स्वाभाविक है,इस बात को ध्यान रखकर किसी भी जातक की उपेक्षा नही करना चाहिये,सरस्वती किसी भी रूप में आकर परीक्षा ले सकती है,और परीक्षा में खरा नही उतरने पर वह किसी भी प्रकार से लांक्षित करने के बाद समाज और दुनिया से वहिष्कार कर सकती है,जिसके ऊपर सरस्वती महरवान होगी वह ही किसी के प्रति अपनी पिछली और आगे की कहानी का कथन कर पायेगा।

    २.जब प्रश्न करने वाला अनायास घटना का वर्णन करता है तो उसे उस घटना तथा उसके अपने अनुमान में कोई अन्तर नही मिलेगा,दूसरे शब्दों में अगर समय कुन्डली या जन्म कुन्डली सही है तो वह गोचर के ग्रहों के द्वारा घटना का वर्णन अपने करने लगेगी।

    ३.जिस किसी घटना या समस्या का विचार प्रच्छक के मन में होता है,वह समय कुन्डली बता देती है,और जन्म कुन्डली में गोचर का ग्रह उसके मन में किस समस्या का प्रभाव दे रहा है,वह समस्या कब तक उसके जीवन काल में बनी रहेगी,यह सब समस्या देने वाले ग्रह के अनुसार और चन्द्रमा के अनुसार कथन करने से आसानी रहेगी।

    ४.प्रच्छक की तर्क ही ज्योतिषी के लिये किसी शास्त्र को जानने वाले से अधिक है,उसकी हर तर्क ज्योतिषी को पक्का भविष्य वक्ता बना देती है,जो जितना तर्क का जबाब देना जानता है,वही सफ़ल ज्योतिषियों की श्रेणी में गिना जाता है।

    ५.कुशल ज्योतिषी अपने को सामने आने वाली समस्याओं से बचाकर चलता है,उसे शब्दों का ज्ञान होना अति आवश्यक है,किसी की मृत्यु का बखान करते वक्त "मर जाओगे",की जगह "संभल कर चलना" कहना उत्तम है।

    ६.कुन्डली के अनुसार किसी शुभ समय में किसी कार्य को करने का दिन तथा घंटा निश्चित करो,अशुभ समय में आपकी विवेक शक्ति ठीक से काम नही करेगी,चाहे आंखों से देखने के बाद आपने कोई काम ठीक ही क्यों न किया हो,लेकिन किसी प्रकार की विवेक शक्ति की कमी से वह काम अधूरा ही माना जायेगा।

    ७.ग्रहों के मिश्रित प्रभावों को समझने की बहुत आवश्यक्ता होती है,और जब तक आपने ग्रहों ,भावों और राशियों का पूरा ज्ञान प्राप्त नही किया है,आपको समझना कठिन होगा,जो मंगल चौथे भाव में मीठा पानी है,वही मंगल आठवें भाव में शनि की तरह से कठोर और जली हुई मिट्टी की तरह से गुड का रूप होता है,बारहवें भाव में जाते जाते वह मीठा जली हुयी शक्कर का हवा से भरा बतासा बन जाता है।

    ८.सफ़ल भविष्य-वक्ता किसी भी प्रभाव को विस्तार से बखान करता है,समस्या के आने के वक्त से लेकर समस्या के गुजरने के वक्त के साथ समस्या के समाप्त होने पर मिलने वाले फ़ल का सही ज्ञान बताना ही विस्तार युक्त विवेचन कहा जाता है।

    ९.कोई भी तंत्र यंत्र मंत्र ग्रहों के भ्रमण के अनुसार कार्य करते है,और उन्ही ग्रहों के समय के अन्दर ही उनका प्रयोग किया जाता है,यंत्र निर्माण में ग्रहों का बल लेना बहुत आवश्यक होता है,ग्रहो को बली बनाने के लिये मंत्र का जाप करना आवश्यक होता है,और तंत्र के लिये ग्रहण और अमावस्या का बहुत ख्याल रखना पडता है। कहावत भी है,कि मंदिर में भोग,अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग के जाने बिना केवल असत्य का भाषण ही है।

    १०.किसी के प्रति काम के लिये समय का चुनाव करते वक्त सही समय के लिये जरा सा बुरा समय भी जरूरी है,जिस प्रकार से डाक्टर दवाई में जहर का प्रयोग किये बिना किसी रोग को समाप्त नही कर सकता है,शरीर में गुस्सा की मात्रा नही होने पर हर कोई थप्पड मार कर जा सकता है,घर के निर्माण के समय हथियार रखने के लिये जगह नही बनाने पर कोई भी घर को लूट सकता है।

    ११.किसी भी समय का चुनाव तब तक नही हो सकता है,जब तक कि " करना क्या है" का उद्देश्य सामने न हो।

    १२.बैर प्रीति और व्यवहार में ज्योतिष करना बेकार हो जाता है,नफ़रत मन में होने पर सत्य के ऊपर पर्दा पड जाता है,और जो कहा जाना चाहिये वह नही कहना,नफ़रत की निशानी मानी जाती है,बैर के समय में सामने वाले के प्रति भी यही हाल होता है,और प्रेम के वक्त मानसिक डर जो कहना है,उसे नही कहने देता है,और व्यवहार के वक्त कम या अधिक लेने देने के प्रति सत्य से दूर कर देता है।

    १३.ग्रह कथन के अन्दर उपग्रह और छाया ग्रहों का विचार भी जरूरी है,बेकार समझ कर उन्हे छोडना कभी कभी भयंकर भूल मानी जाती है,और जो कहना था या जिस किसी के प्रति सचेत करना था,वह अक्सर इन्ही कारणो से छूट जाता है,और प्रच्छक के लिये वही परेशानी का कारण बन जाता है,बताने वाला झूठा हो जाता है।

    १४.जब भी सप्तम भाव और सप्तम का मालिक ग्रह किसी प्रकार से पीडित है,तो कितना ही बडा ज्योतिषी क्यों न हो,वह कुछ न कुछ तो भूल कर ही देता है,इसलिये भविष्यकथन के समय इनका ख्याल भी रखना जरूरी है।

    १५.तीसरे छठे नवें और बारहवें भाव को आपोक्लिम कहा जाता है,यहां पर विराजमान ग्रह राज्य के शत्रु होते है,केन्द्र और पणफ़र लग्न के मित्र होते है,यह नियम सब जगह लागू होता है।

    १६.शुभ ग्रह जब आठवें भाव में होते है,तो वे अच्छे लोगों द्वारा पीडा देने की कहानी कहते है,लेकिन वे भी शुभ ग्रहों के द्वारा देखे जाने पर पीडा में कमी करते हैं।

    १७.बुजुर्ग व्यक्तियों के आगे के जीवन की कहानी कहने से पहले उनके पीछे की जानकारी आवश्यक है,अगर कोई बुजुर्ग किसी प्रकार से अपने ग्रहों की पीडा को शमन करने के उपाय कर चुका है,तो उसे ग्रह कदापि पीडा नहीं पहुंचायेगा,और बिना सोचे कथन करना भी असत्य माना जायेगा।

    १८.लगन में सूर्य चन्द्र और शुभ ग्रह एक ही अंश राशि कला में विद्यमान हों,या सूर्य चन्द्र आमने सामने होकर अपनी उपस्थित दे रहे हों तो जातक भाग्यशाली होता है,लेकिन पापग्रह अगर उदित अवस्था में है तो उल्टा माना जायेगा।

    १९.गुरु और चन्द्र अगर अपनी युति दे रहे है,चाहे वह राशि में हो,या नवांश में हो,कोई भी पुरानी बात सामने नही आ सकती है,जिस प्रकार से इस युति के समय में दी गयी दस्त कराने की दवा असर नही करती है।

    २०.चन्द्र राशि के शरीर भाग में लोहे के शस्त्र का प्रहार खतरनाक हो जाता है,जैसे कोई भी किसी स्थान पर बैठ कर अपने दांतों को कील से खोदना चालू कर देता है,और उसी समय चन्द्रमा की उपस्थिति उसी भाग में है तो या तो दांत खोदने की जगह विषाक्त कण रह जाने से भयंकर रोग हो जायेगा,और मुंह तक को गला सकता है,और डाक्टर अगर इंजेक्सन चन्द्र के स्थान पर लगा रहा है,तो वह इंजेक्सन या तो पक जायेगा,या फ़िर इंजेक्सन की दवा रियेक्सन कर जायेगी।

    २१.जब चन्द्रमा मीन राशि में हो,और लगनेश की द्रिष्टि पहले भाव से चौथे भाव और सातवें भाव में उपस्थिति ग्रहों पर हो तो इलाज के लिये प्रयोग की जाने वाली दवा काम कर जायेगी,और अगर लगनेश का प्रभाव सातवें भाव से दसवें भाव और दसवें भाव से पहले भाव तक के ग्रहों पर पड रही है तो वह दवा उल्टी के द्वारा बाहर गिर जायेगी,या फ़ैल जायेगी।

    २२.सिंह राशि के चन्द्रमा में कभी भी नया कपडा नही पहिनना चाहिये,और न ही पहिना जाने वाला उतार कर हमेशा के लिये दूर करना चाहिये,और यह तब और अधिक ध्यान करने वाली बात होती है जब चन्द्रमा किसी शत्रु ग्रह द्वारा पीडित हो रहा हो,कारण वह वस्त्र पहिनने वाला या तो मुशीबतों के अन्दर आ जायेगा,या वह कपडा ही बरबाद हो जायेगा।

    २३.चन्द्रमा की अन्य ग्रहों पर नजर मनुष्य के जीवन में अकुलाहट पैदा कर देती है,शक्तिशाली नजर फ़ल देती है,और कमजोर नजर केवल ख्याल तक ही सीमित रह जाती है।

    २४.चन्द्रमा के जन्म कुन्डली में केन्द्र में होने पर अगर कोई ग्रहण पडता है,तो वह खतरनाक होता है,और उसका फ़ल लगन और ग्रहण स्थान के बीच की दूरी के अनुसार होता है,जैसे सूर्य ग्रहण में एक घंटा एक साल बताता है,और चन्द्र ग्रहण एक घंटा को एक मास के लिये बताता है। उदाहरण के लिये मान लीजिये कि ग्रहण के समय चन्द्रमा चौथे भाव पहले अंश पर है,और लगन से चौथा भाव लगन में आने का वक्त सवा दो घंटे के अनुसार लगन बदलने का पौने सात घंटे का समय लगता है,तो प्रभाव भी चन्द्र ग्रहण के अनुसार पोने सात महिने के बाद ही मिलेगा,और सूर्य ग्रहण से पोने सात साल का समय लगेगा।

    २५.दसवें भाव के कारक ग्रह की गति भूमध्य रेखा से नापी जाती है,और लगन के कारक ग्रह की गति अक्षांश के अनुसार नापना सही होता है। जैसे एक जातक का पिता अपने घर से कहीं चला गया है,तो उसका पता करने के लिये भूमध्य रेखा से पिता के कारक ग्रह की दूरी नापने पर पिता की स्थिति मिल जायेगी,एक अंश का मान आठ किलोमीटर माना जाता है,और लगनेश की दूरी के लिये अक्षांश का हिसाब लगना पडेगा।

    २६.यदि किसी विषय का कारक सूर्य से अस्त हो,चाहे कुन्डली के अस्त भाग १,४,७, में या अपने से विपरीत स्थान में हो तो कुछ बात छिपी हुई है,परन्तु बात खुल जायेगी यदि कारक उदित हो या उदित भाग में हो।

    २७.जिस राशि में शुक्र बैठा हो उसके अनुरूप शरीर के भाग में शुक्र द्वारा सुख मिलता है,ऐसा ही दूसरे ग्रहों के साथ भी होता है।

    २८.यदि चन्द्रमा का स्वभाव किसी से नही मिलता है,तो नक्षत्र के देखना चाहिए।

    २९.नक्षत्र पहले सूचित किये बिना फ़ल देते है,यदि कारक ग्रह से मेल नही खाते है तो कष्ट भी अक्समात देते हैं।

    ३०.यदि किसी नेता की शुरुआत उसके पैतृक जमाने से लगन के अनुरूप है,तो नेता का पुत्र या पुत्री ही आगे की कमान संभालेगी।

    ३१.जब किसी राज्य का कारक ग्रह अपने संकट सूचक स्थान में आजाता है,तो राज्य का अधिकारी मरता है।

    ३२.दो आदमियों में तभी आपस में सदभावना होती है,जब दोनो के ग्रह किसी भी प्रकार से अपना सम्पर्क आपस में बना रहे होते है,आपसी सदभावना के लिये मंगल से पराक्रम में,बुध से बातचीत से,गुरु से ज्ञान के द्वारा,शुक्र से धन कमाने के साधनों के द्वारा,शनि से आपस की चालाकी या फ़रेबी आदतों से,सूर्य से पैतृक कारणों से चन्द्र से भावनात्मक विचारों से राहु से पूर्वजों के अनुसार केतु से ननिहाल परिवार के कारण आपस में प्रधान सदभावना प्रदान करते हैं।

    ३३.दो कुन्डलियों के ग्रहों के अनुसार आपस में प्रेम और नफ़रत का भाव मिलेगा,अगर किसी का गुरु सही मार्ग दर्शन करता है,तो कभी नफ़रत और कभी प्रेम बनता और बिगडता रहता है।

    ३४.अमावस्या का चन्द्र राशि का मालिक अगर केन्द्र में है तो वह उस माह का मालिक ग्रह माना जायेगा।

    ३५.जब कभी सूर्य किसी ग्रह के जन्मांश के साथ गोचर करता है,तो वह उस ग्रह के प्रभाव को सजग करता है।

    ३६.किसी शहर के निर्माण के समय के नक्षत्रों का बोध रखना चाहिये,घर बनाने के लिये ग्रहों का बोध होना चाहिये,इनके ज्ञान के बिना या तो शहर उजड जाते है,या घर बरबाद हो जाते हैं।

    ३७.कन्या और मीन लगन का जातक स्वयं अपने प्रताप और बल पर गौरव का कारण बनेगा,लेकिन मेष या तुला में वह स्वयं अपनी मौत का कारण बनेगा।

    ३८.मकर और कुम्भ का बुध अगर बलवान है,तो वह जातक के अन्दर जल्दी से धन कमाने की वृत्ति प्रदान करेगा,और जासूसी के कामों के अन्दर खोजी दिमाग देगा,और अगर बुध मेष राशि का है तो बातों की चालाको को प्रयोग करेगा।

    ३९.तुला का शुक्र दो शादियां करवा कर दोनो ही पति या पत्नियों को जिन्दा रखता है,जबकि मकर का शुक्र एक को मारकर दूसरे से प्रीति देता है।

    ४०.लगन पाप ग्रहों से युत हो तो जातक नीच विचारों वाला,कुकर्मो से प्रसन्न होने वाला,दुर्गन्ध को अच्छा समझने वाला होता है।

    ४१.यात्रा के समय अष्टम भाव में स्थित पापग्रहों से खबरदार रहो,पापग्रहों की कारक वस्तुयें सेवन करना,पापग्रह के कारक आदमी पर विश्वास करना और पाप ग्रह की दिशा में यात्रा करना सभी जान के दुश्मन बन सकते हैं।

    ४२.यदि रोग का आरम्भ उस समय से हो जब चन्द्रमा जन्म समय के पाप ग्रहों के साथ हो,या उस राशि से जिसमे पाप ग्रह है,से चार सात या दसवें भाव में हो तो रोग भीषण होगा,और रोग के समय चन्द्रमा किसी शुभ ग्रह के साथ हो या शुभ ग्रह से चार सात और दसवें भाव में हो तो जीवन को कोई भय नही होगा।

    ४३.किसी देश के पाप ग्रहों का प्रभाव गोचर के पाप ग्रहों से अधिक खराब होता है।

    ४४.यदि किसी बीमार आदमी की खबर मिले और उसकी कुन्डली और अपनी कुन्डली में ग्रह आपस में विपरीत हों तो स्थिति खराब ही समझनी चाहिये।

    ४५.यदि लगन के मुख्य कारक ग्रह मिथुन कन्या धनु और कुम्भ के प्रथम भाग में न हों,तो जातक मनुष्यता से दूर ही होगा,उसमे मानवता के लिये कोई संवेदना नही होती है।

    ४६.जन्म कुन्डलियों में नक्षत्रों को महत्व दिया जाता है,अमावस्या की कुन्ड्ली में ग्रहों का मासिक महत्व दिया जाता है,किसी भी देश का भाग्य (पार्ट आफ़ फ़ार्च्यून) का महत्व भी उतना ही जरूरी है।

    ४७.अगर किसी की जन्म कुन्डली में पाप ग्रह हों और उसके सम्बन्धी की कुन्डली में उसी जगह पर शुभ ग्रह हों,तो पाप ग्रह शुभ ग्रहों को परेशान करने से नही चूकते।

    ४८.यदि किसी नौकर का छठा भावांश मालिक की कुन्डली का लगनांश हो,तो दोनो को आजीवन दूर नही किया जा सकता है।

    ४९.यदि किसी नौकर का लगनांश किसी मालिक का दसवांश हो तो मालिक नौकर की बात को मान कर कुंये भी कूद सकता है।

    ५०.एक सौ उन्नीस युक्तियां ज्योतिष में काम आती है,बारह भाव,बारह राशिया,अट्ठाइस नक्षत्र द्रेष्काण आदि ही ११९ युक्तियां हैं।

    ५१.जन्म की लगन को चन्द्र राशि से सप्तम मानकर किसी के चरित्र का विश्लेषण करो,देखो कितने गूढ सामने आते है,और जो पोल अच्छे अच्छे नही खोल सकते वे सामने आकर अपना हाल बताने लगेंगीं।

    ५२.व्यक्ति की लम्बाई का पता करने के लिये लग्नेश दसवांश के पास होने वाला कारक लम्बा होगा,तथा अस्त और सप्तम के पास कारक ठिगना होगा।

    ५३.पतले व्यक्तियों का लगनेश अक्षांश के पास शून्य की तरफ़ होगा,मोटे व्यक्तियों का अक्षांश अधिक होगा,उत्तर की तरफ़ वाला अक्षांश बुद्धिमान होगा,और दक्षिण की तरफ़ वाला अक्षांश मंद बुद्धि होगा।

    ५४.घर बनाते समय कारक ग्रहों में कोई ग्रह अस्त भाग २,३,४,४,६,७वें भाव में हो तो उसी कारक के द्वारा घर बनाने में बाधा पडेगी।

    ५५.यात्रा में मंगल अगर दस या ग्यारह में नही है,तो विघ्न नही होता है,यदि यात्रा के समय मंगल इन स्थानों में है तो यात्रा में किसी न किसी प्रकार की दुर्घटना होती है,या चोरी होती है,अथवा किसी न किसी प्रकार का झगडा फ़साद होता है।

    ५६.अमावस तक शरीर के दोष बढते है,और फ़िर घटने लगते हैं।

    ५७.किसी रोग में प्रश्न कुन्डली में अगर सप्तम भाव या सप्तमेश पीडित है तो फ़ौरन डाक्टर को बदल दो।

    ५८.किसी भी देश की कुन्डली की वर्ष लगन में ग्रह की द्रिष्टि अंशों में नाप कर देखो,घटना तभी होगी जब द्रिष्टि पूर्ण होगी।

    ५९.किसी बाहर गये व्यक्ति के वापस आने के बारे में विचारो तो देखो कि वह पागल तो नही है,इसी प्रकार से किसी के प्रति घायल का विचार करने से पहले देखो कि उसके खून कही किसी बीमारी से तो नही बह रहा है,किसी के लिये दबे धन को मिलने का विचार कहने से पहले देखो कि उसका अपना जमा किया गया धन तो नही मिल रहा है,कारण इन सबके ग्रह एक सा ही हाल बताते हैं।

    ६०.रोग के विषय में विचार करो कि चन्द्रमा जब रोग खतरनाक था,तब २२-३० का कोण तो नही बना रहा था,और जब बना रहा था,तो किस शुभ ग्रह की द्रिष्टि उस पर थी,वही ग्रह बीमार को ठीक करने के लिये मान्य होगा।

    ६१.शरीर के द्वारा मानसिक विचार का स्वामी चन्द्रमा है,वह जैसी गति करेगा,मन वैसा ही चलायमान होगा।

    ६२.अमावस्या पूर्ण की कुन्डली बनाकर आगामी मास के मौसम परिवर्तन का पता किया जा सकता है,केन्द्र के स्वामी वायु परिवर्तन के कारक है,और इन्ही के अनुसार परिणाम प्रकाशित करना उत्तम होगा।

    ६३.गुरु शनि का योग दसवें भाव के निकट के ग्रह पर होता है,वह धर्मी हो जाता है,और अपने अच्छे बुरे विचार कहने में असमर्थ होता है।

    ६४.कार्य के स्वामी को देखो कि वह वर्ष लगन में क्या संकेत देता है,उस संकेत को ध्यान में रखकर ही आगे के कार्य करने की योजना बनाना ठीक रहता है।

    ६५.कम से कम ग्रह युति का मध्यम युति से और मध्यम युति का अधिकतम युति से विचार करने पर फ़ल की निकटता मिल जाती है।

    ६६.किसी के गुण दोष विचार करते वक्त कारक ग्रह का विचार करना उचित रहता है,अगर उस गुण दोष में कोई ग्रह बाधा दे रहा है,तो वह गुण और दोष कम होता चला जायेगा।

    ६७.जीवन के वर्ष आयु के कारक ग्रह की कमजोरी से घटते हैं।

    ६८.सुबह को उदित पाप ग्रह आकस्मिक दुर्घटना का संकेत देता है,यह अवस्था ग्रह के बक्री रहने तक रहती है,चन्द्र की स्थिति अमावस से सप्तमी तक यानी सूर्य से ९० अंश तक सातवें भाव तक अस्त ग्रह रोग का संकेत करता है।

    ६९.अगर चन्द्रमा सातवें भाव में है और चौथे भाव में या दसवें भाव में शनि राहु है,तो जातक की नेत्र शक्ति दुर्बल होती है,कारण सूर्य चन्द्र को नही देख पाता है,और चन्द्र सूर्य को नही देख पाता है,यही हाल दुश्मन और घात करने वालों के लिये माना जाता है।

    ७०.यदि चन्द्रमा बुध से किसी प्रकार से भी सम्बन्ध नही रखता है,तो व्यक्ति के पागलपन का विचार किया जाता है,साथ ही रात में शनि और दिन में मंगल कर्क कन्या या मीन राशि का हो।

    ७१.सूर्य और चन्द्र पुरुषों की कुन्डली में राशि के अनुसार फ़ल देते है,लेकिन स्त्री की राशि में राशि के प्रभाव को उत्तेजित करते है,सुबह को उदित मंगल और शुक्र पुरुष रूप में है और शाम को स्त्री रूप में।

    ७२.लगन के त्रिकोण से शिक्षा का विचार किया जाता है,सूर्य और चन्द्र के त्रिकोण से जीवन का विचार किया जाता है।

    ७३.यदि सूर्य राहु के साथ हो और किसी भी सौम्य ग्रह से युत न हो या किसी भले ग्रह की नजर न हो,सूर्य से मंगल सप्तम में हो,और कोई भला ग्रह देख नही रहा हो,सूर्य से मंगल चौथे और द्सवें में हों,कोई भला ग्रह देख नही रहा हो,तो फ़ांसी का सूचक है,यदि द्रिष्टि मिथुन या मीन में हो,तो अंग भंग होकर ही बात रह जाती है।

    ७४.लगन का मंगल चेहरे पर दाग देता है,छठा मंगल चोरी का राज छुपाता है।

    ७५.सिंह राशि का सूर्य हो और मंगल का लगन पर कोई अधिकार न हो,आठवें भाव में कोई शुभ ग्रह नही हो तो जातक की मौत आग के द्वारा होता है।

    ७६.दसवां शनि और और चौथा सूर्य रात का चन्द्रमा बन जाता है,चौथी राशि अगर वृष कन्या या मकर हो तो जातक अपने ही घर में दब कर मरता है,यदि कर्क वृश्चिक मीन हो तो वह पानी में डूब कर मरेगा,नर राशि होने पर लोग उसका गला घोंटेंगे,या फ़ांसी होगी,अथवा उत्पात से मरेगा,यदि आठवें भाव में कोई शुभ ग्रह हो तो वह बच जायेगा।

    ७७.शरीर की रक्षा के लिये लगन का बल,धन के भाग्य बल आत्मा का शरीर से सम्बन्ध बनाने के लिये चन्द्र बल,और नौकरी व्यापारादि के लिये दसम का बल आवश्यक है।

    ७८.ग्रह अक्सर उस स्थान को प्रभावित करता है,जहां पर उसका कोई लेना देना नही होता है,इसीसे जातक को अचानक लाभ या हानि होती है।

    ७९.जिसके ग्यारहवें भाव में मंगल होता है,वह अपने स्वामी पर अधिकार नही रख पाता है।

    ८०.शनि से शुक्र युत हो तो किसकी संतान है,उसका पता नही होता।

    ८१.समय का विचार सात प्रकार से किया जाता है,(अ) दो कारकों के बीच का अंतर (ब)उनकी आपसकी द्रिष्टि का अंतर (स) एक का दूसरे की ओर बढना (द) उनमे किसी के बीच का अन्तर घटना के कारक ग्रह का (य) ग्रह के अस्त द्वारा (र) कारक के स्थान परिवर्तन से (ल) किसी कारक ग्रह के अपने स्थान पर आने के समय से।

    ८२.अगर अमावस या पूर्णिमा की कुन्डली में ज्योतिषी का ग्रह किसी ग्रह से दबा हुआ हो तो उसे किसी का भी भविष्य कथन नही करना चाहिये,कारण वह चिन्ता के कारण कुछ का कुछ कह जायेगा।

    ८३.राज्य का ग्रह और आवेदन करने वाले का ग्रह आपस में मित्रता किये है,तो आवेदन का विचार सरकारी आफ़िस में किया जाता है।

    ८४.यदि किसी भी धन कमाने वाले काम की शुरुआत की जावे,और मंगल दूसरे भाव में है,तो कार्य में कभी सफ़लता नही मिलेगी।

    ८५.यदि देश की शासन व्यवस्था की बागडोर लेते समय लगनेश और द्वितीयेश आपस में सम्बन्ध रखे हैं,तो बागडोर लेने वाला कब किस प्रकार का परिवर्तन कर दे किसी को पता नही होता।

    ८६.सूर्य से जरूरी ताकत का पता चलता है,और चन्द्र से जरूरी भी नही है उसका।

    ८७.मासिक कुन्डली २८ दिन २ घंटे और १८ मिनट के बाद बनती है,वार्षिक कुन्डली ३६५.१/४ दिन के बाद।

    ८८.वर्ष कुन्डली में सूर्य से चन्द्र की दूरी पर मानसिक इच्छा की पूर्ति होती है।

    ८९.अपने दादा के बारे में राहु और सप्तम भाव से जाना सकता है,और चाचा के बारे में गुरु और छठे भाव से।

    ९०.यदि कारक ग्रह की द्रिष्टि लगन से है,तो होने वाली घटना लगन के अनुसार होगी,यदि लगन के साथ युति नही है,तो कारक जहां पर विराजमान है,वहां पर होगी,होरा स्वामी से उसका रंग पता लगेगा,समय का चन्द्र से पता लगेगा,यदि कुन्डली में अह भाग उदित है तो नये प्रकार की वस्तु होगी,अस्त भाग में वह पुरानी वस्तु होगी।

    ९१.रोगी का स्वामी अस्त होना अशुभ है,जबकि भाग्येश भी पीडित हों।

    ९२.पूर्व भाग में उदय शनि और पश्चिम भाग में उदय मंगल अधिक कष्ट नही देता है।

    ९३.किसी की भी कुन्डली को आगे आने वाली युति के बिना मत विचारो,क्योंकि युति के बिना उसे क्या बता सकते हो,वह आगे जाकर सिवाय मखौल के और कुछ नही करने वाला।

    ९४.अधिक बली ग्रह समय कुन्डली में प्रश्न करने वाले के विचार प्रकट करता है।

    ९५.दसवें भाव में उदय होने वाला ग्रह जातक के कार्य के बारे में अपनी सफ़लता को दर्शाता है।

    ९६.ग्रहण के समय केन्द्र के पास वाले ग्रह आगामी घटनाओं के सूचक हैं,घटना की जानकारी राशि और ग्रह के अनुसार बतायी जा सकती है।

    ९७.अमावस्या या पूर्णिमा की कुन्डली में लगनेश अगर केन्द्र में है,तो कार्य को सिद्ध होने से कोई रोक नही सकता है।

    ९८.उल्कापात के लिये भले आदमी विचार नही करते है,पुच्छल तारे के उदय के समय आगामी अकाल दुकाल का विचार किया जा सकता है।

    ९९.जिस भाग में उल्का पात होता है,उस भाग में हवा सूखी हो जाती है,और सूखी हवा के कारण अकाल भी पड सकता है,अंधड भी आ सकता है,सेना भी संग्राम में जूझ सकती है,अकाल मृत्यु की गुंजायश भी हो सकती है।

    १००.पुच्छल तारा अगर सूर्य से ११ राशि पीछे उदय हो तो राजा की मृत्यु होती है,यदि ३,६,९,१२, में उदय हो तो राज्य को धन का लाभ होता है,लेकिन राष्ट्रपति या राज्यपाल का बदलाव होता है।

  • वास्तुदोष दूर करें इन

    वास्तुदोष दूर करें इन फोटो/चित्रों द्वारा----
    अपने घर/मकान में लगायें ये चित्र, होगा वास्तु दोष दूर-----

    वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार वास्तु न सिर्फ आपके घर को बल्कि आपके जीवन को भी प्रभावित करता है। जीवन में आने वाली परेशानियों का कारण घर का वास्तु दोष भी हो सकता है। भवन निर्माण एक ऐसी अद्भुत कला है, जिसमें यदि वास्तु के नियमों का पूरी तरह से पालन किया जाए, तो उस भवन में निवास करने वालों को कभी भी कष्ट और समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता।

    आप जानते हें की चित्रों/आकृतियों /फोटो का इतिहास अति प्राचीन है। इनका उपयोग मानव सभ्यता के विकास के आरंभिक काल से ही होता आया है। अमीर, गरीब सब चित्रों का उपयोग कर अपने अपने घरों का शृंगार करते हैं। घर में चित्रों के उपयोग से वास्तु के अनेकानेक दोषों से मुक्ति मिल सकती है। इसका उल्लेख विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। पुराणों में कई स्थानों पर वास्तु दोषों के शमन के लिए चित्र, नक्काशी, बेल बूटे, मनोहारी आकृतियों आदि के उपयोग का वर्णन है। चित्र बनाने में गाय के गोबर का उपयोग किया जाता था।
    वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार राजा भोज का समरांगन सूत्राधार, विश्वकर्मा प्रकाश, राजबल्लभ, शिल्प संग्रह, विश्वकर्मीय शिल्प, बृहद्वास्तु माला आदि वास्तु शास्त्र के महत्वपूर्ण गं्रथ माने जाते हैं। इन ग्रंथों में वास्तु दोषों के शमन हेतु चित्रों के उपयोग का विशद वर्णन है। तंत्र शास्त्र में भी भवन को वास्तुदोष से मुक्त रखने हेतु अलग-अलग वनस्पतियों को जलाकर कोयले से विभिन्न यंत्राकृतियों की रचना का विधान है। आजकल लोग अपनी इच्छानुसार कहीं भी किसी का भी चित्र लगा लेते हैं, जो सर्वथा अनुचित है।

    वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार यहां घर को वास्तु दोषों से मुक्त रखने के लिए कौन से चित्र कहां लगाने चाहिए इसका एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है------
    -----घर के अन्दर और बाहर सुन्दर चित्र , पेंटिंग , बेल- बूटे , नक्काशी लगाने से ना सिर्फ सुन्दरता बढती है , वास्तु दोष भी दूर होते है।
    -----रसोई घर में माँ अन्नपूर्णा का चित्र शुभ माना जाता है।
    ------रसोई घर आग्नेय कोण में नहीं है तो ऋषि मुनियों की तस्वीर लगाए।
    -------मुख्य द्वार यदि वास्तु अनुरूप ना हो तो उस पर नक्काशी , बेल बूटे बनवाएं।
    -----युद्ध प्रसंग, रामायण या महाभारत के युद्ध के चित्र, क्रोध, वैराग्य, डरावना, वीभत्स, दुख की भावना वाला, करुण रस से ओतप्रोत स्त्री, रोता बच्चा, अकाल, सूखे पेड़ कोई भी चित्र घर में न लगायें।
    ------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार घर में दक्षिण दीवार पर हनुमान जी का लाल रंग का चित्र लगाएं। ऐसा करने से अगर मंगल आपका अशुभ है तो वो शुभ परिणाम देने लगेगा। हनुमान जी का आशीर्वाद आपको मिलने लगेगा। साथ ही पूरे परिवार का स्वास्थय अच्छा रहेगा।
    -----घर का उत्तर पूर्व कोना (इशान कोण) स्वच्छ रखें व वंहा बहते पानी का चित्र लगायें | (ध्यान रहे इस चित्र में पहाड़/पर्वत न हो )
    ----अपनी तस्वीर उत्तर या पूर्व दिशा मैं लगायें
    -----उत्तर क्षेत्र की दीवार पर हरियाली या हरे चहकते हुए पक्षियों (तोते की तस्वीर) का शुभ चित्र लगाएं। ऐसा करने से परिवार के लोगों की एकाग्रता बनेगी साथ ही बुध ग्रह के शुभ परिणाम मिलेंगे। उत्तर दिशा बुध की होती है।
    -----दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए घर में राधा कृष्ण की तस्वीर लगाएं।
    ----पढने के कमरे में माँ सरस्वती , हंस , वीणा या महापुरुषों की तस्वीर लगाएं।
    -----व्यापर में सफलता पाने के लिए कारोबार स्थल पर सफल और नामी व्यापारियों के चित्र लगाएं।
    ----ईशान कोण में शौचालय होने पर उसके बाहर शेर का चित्र लगाएं।
    -----लक्ष्मी व कुबेर की तस्वीरें भी उत्तर दिशा में लगानी चाहिए। ऐसा करने से धन लाभ होने की संभावना है।
    घर में जुडवां बत्तख व हंस के चित्र लगाना लगाना श्रेष्ठ रहता है। ऐसा करने से समृद्धि आती है।
    ----वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार घर की तिजोरी के पल्ले पर बैठी हुई लक्ष्मीजी की तस्वीर जिसमें दो हाथी सूंड उठाए नजर आते हैं, लगाना बड़ा शुभ होता है। तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम या ऑफ व्हाइट रखना चाहिए।

    ----घर में नाचते हुए गणेश की तस्वीर लगाना अति शुभ होता है।
    ---बच्चा जिस तरफ मुंह करके पढता हो, उस दीवार पर मां सरस्वती का चित्र लगाएं। पढाई में रूचि जागृत होगी।
    -----वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार बच्चों के उत्तर-पूर्व दीवार में लाल पट्टी के चायनीज बच्चों की युगल फोटों लगाएं। ऎसा करने से घर में खुशियां आएंगी और आपके बच्चो का करियर अच्छा बनेगा। इन उपायों को अपनाकर आप अपने बच्चे को एक अच्छा करियर दे सकते हैं और जीवन में सफल बना सकते हैं।
    ----अध्ययन कक्ष में मोर, वीणा, पुस्तक, कलम, हंस, मछली आदि के चित्र लगाने चाहिए।
    ---बच्चों के शयन कक्ष में हरे फलदार वृक्षों के चित्र, आकाश, बादल, चंद्रमा अदि तथा समुद्र तल की शुभ आकृति वाले चित्र लगाने चाहिए।
    ----फल-फूल व हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें जीवन शक्ति का प्रतीक है। उन्हें पूर्वी व उत्तरी दीवारों पर लगाएं।
    ----ऐसे नवदम्पत्ति जो संतान सुख पाना चाहते हैं वे श्रीकृष्ण का बाल रूप दर्शाने वाली तस्वीर अपने बेडरूम में लगाएं।
    -----यदि आप अपने वैवाहिक रिश्ते को अधिक मजबुत और प्रसन्नता से भरपूर बनाना चाहते हैं तो अपने बेडरुम में नाचते हुए मोर का चित्र लगाएं।
    -----यूं तो पति-पत्नी के कमरे में पूजा स्थल बनवाना या देवी-देवताओं की तस्वीर लगाना वास्तुशास्त्र में निषिद्ध है फिर भी राधा-कृष्ण अथवा रासलीला की तस्वीर बेडरूम में लगा सकते हैं। इसके साथ ही बांसुरी, शंख,
    ------------हिमालय आदि के चित्र दाम्पत्य सुख में वृद्धि के कारक होते हैं।
    ------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार कैरियर में सफलता प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में जंपिंग फिश, डॉल्फिन या मछालियों के जोड़े का प्रतीक चिन्ह लगाए जाने चाहिए। इससे न केवल बेहतर कैरियर की ही प्राप्ति होती है बल्कि व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है।
    ------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार अपने शयन कक्ष की पूर्वी दीवार पर उदय होते हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए शुभ उर्जा वाले पक्षियों के चित्र लगाएं। निराश, आलस से परिपूर्ण, अकर्मण्य, आत्मविश्वास में कमी अनुभव करने वाले व्यक्तियों के लिए यह विशेष प्रभावशाली है।
    -----अगर किसी का मन बहुत ज्यादा अशांत रहता है तो अपने घर के उत्तर-पूर्व में ऐसे बगुले का चित्र लगाना चाहिए जो ध्यान मुद्रा मैं हो।
    -----पूर्वजों की तस्वीर देवी देवताओं के साथ ना लगाएं।उनकी तस्वीर का मुंह दक्षिण की ओर होना चाहिए।स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिण की दीवार पर लगाने से सुख समृधि बढेगी
    ----दक्षिण मुखी भवन के द्वार पर नौ सोने या पीतल के नवग्रह यंत्र लगाए और हल्दी से स्वस्तिक बनाए।
    -----सोने का कमरा आग्नेय कोण में हो तो पूर्वी दीवार के मध्य में समुद्र का चित्र लगाए।
    -----घर के मंदिर में देवी-देवता के समीप अपने स्वर्गीय परिजनों के फोटो कदापि नहीं लगाने चाहिए।
    ------अन्य चित्रों का उपयोग यदि ईशान कोण में शौचालय हो, तो उसके बाहर शिकार करते हुए शेर का चित्र लगाएं।
    ------अग्नि कोण में रसोई घर नहीं हो, तो उस कोण में यज्ञ करते हुए ऋषि-विप्रजन की चित्राकृति लगानी चाहिए।
    -------रसोई घर में अन्नपूर्णा का चित्र शुभ माना गया है, किंतु रसोई में मत्स्य, मांसादि भी बनाए जाते हंै इसलिए अन्नपूर्णा का चित्र नहीं बल्कि महाविद्या छिन्नमस्ता का चित्र लगाना चाहिए।
    ------यदि मुख्य द्वार वास्तु सिद्धांत के प्रतिकूल तथा छोटा हो, तो उसके इर्द-गिर्द बेलबूटे इस प्रकार लगाने चाहिए कि वह बड़ा दिखाई दे।
    --------शयन कक्ष अग्नि कोण में हो, तो पूर्व मध्य दीवार पर शांत समुद्र का चित्र लगाना चाहिए।
    --------दक्षिणमुखी मकान प्रायः शुभ नहीं होते किंतु वास्तुसम्मत उपाय कर उनकी शुभता में वृद्धि की जा सकती है। इस हेतु स्वर्ण पालिश युक्त नवग्रह यंत्र मुख्य द्वार के पास स्थापित करना चाहिए। साथ ही द्वार पर हल्दी का स्वस्तिक भी बनाना चाहिए।
    ------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार व्यापार तथा व्यवसाय के अनुरूप चित्रों का चयन दुकान, कार्यालय, कारखाने आदि में उनके अनुकूल चित्र लगाकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए आजकल चित्रों का भरपूर उपयोग किया जाता है। किंतु रुदन करते हुए व्यक्ति, बंद आंखों के प्राणियों के समूह, दुखी जनों, सूअर, बाघ, सियार, सांप, उल्लू, खरगोश, बगुला आदि के चित्रों के साथ-साथ भयानक आकृतियों वाले और दीनता दर्शाने वाले चित्र कदापि नहीं लगाने चाहिए।
    -------संस्थान से जुड़े कार्यों के चित्र शुभ होते हैं। व्यक्ति को चाहिए कि वह जो व्यापार करता हो वही व्यापार करने वाले विश्व प्रसिद्ध व्यक्तियों के चित्र अपने संस्थान में उपयुक्त स्थान पर लगाए। अपने प्रेरणा स्रोत का फोटो भी अच्छी सफलता में सहयोगी होता है।
    ---------अध्ययन कक्ष में मोर, वीणा, पुस्तक, कलम, हंस, मछली आदि के चित्र लगाने चाहिए। बच्चों के शयन कक्ष में हरे फलदार वृक्षों के चित्र, आकाश, बादल, चंद्रमा अदि तथा समुद्र तल की शुभ आकृति वाले चित्र लगाने चाहिए।
    ---------पति-पत्नी के शयन कक्ष में भगवान कृष्ण की रासलीला, बांसुरी, शंख, हिमालय आदि के चित्र दाम्पत्य सुख में वृद्धि के कारक होते हैं।
    --------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार यदि भवन में प्रवेश करते समय अंदर की ओर कोई सूनी दीवार है तो उसके कारण परिवार में अशांति बनी रहती है।इस वास्तु दोष के निवारण के लिए भवन की दीवार पर गणेश जी का सुंदर चित्र लगा दें। भवन के मुख्य द्वार के ठीक सामने भवन की ओर आने वाली सड़क का होना एक ऐसा वास्तु दोष है, जो परिवार के सदस्यों के लिए असहनीय कष्ट व समस्याओं का कारण बनता है। इस वास्तु दोष को दूर करने के लिए भवन के द्वार पर शिव यंत्र या दुर्गा यंत्र लगाकर उसके ठीक ऊपर हल्का प्रकाश देने वाला लाल रंग का बल्ब जलाना चाहिए। भवन के मुख्य द्वार पर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र लगाने से भी यह वास्तु दोष दूर होता है।
    -------बैठक में रामायण, कृष्ण लीला तथा पौराणिक प्रसंगों के चित्र लगाने चाहिए। किंतु युद्ध, विकलांगता, भयनाक आकृति वाले तथा अंधों के चित्र कदापि नहीं लगाने चाहिए।
    -------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार जिन देवताओं के दो से ज्यादा हाथों में अस्त्र हों उनके चित्र भी नहीं लगाने चाहिए। घर के आसपास जो मंदिर हो, उसमें स्थापित देवी या देवता का चित्र मुख्य द्वार पर लगाना चाहिए।
    ----यदि ईशान कोण में शौचालय हो, तो उसके बाहर शिकार करते हुए शेर का चित्र लगाएं।
    अग्नि कोण में रसोई घर नहीं हो, तो उस कोण में यज्ञ करते हुए ऋषि-विप्रजन की चित्राकृति लगानी चाहिए।
    ----- सफेद आकड़े की जड़ की गणेश जी की आकृति बनाकर उसकी नियमित रूप से विधिवत् पूजा करते रहें, घर वास्तु दोषों से सुरक्षित रहेगा।
    ---- शयन कक्ष में सदैव सुंदर, कलात्मक फूलों या हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें लगाने से नींद भी बेहतर आती है।
    ------स्वस्तिक, मंगल कलश, ओम, 786 आदि मंगल चिन्हों की तस्वीरें घर में अवश्य लगाएं। इनसे घर में सुख-शांति बढ़ती है।
    ------डाइनिंग हॉल की दीवारों पर फल-फूलों व प्राकृतिक दृश्यों के अच्छे चित्र लगाए जा सकते हैं।
    ------वास्तुविद एवं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री (मोब.--09024390067 ) के अनुसार यदि भवन में गलत दिशा में कोई भी जल स्रोत हो तो इस वास्तु दोष के कारण परिवार में शत्रु बाधा, बीमारी व मन मुटाव देखने को मिलता है। इस दोष को दूर करने के लिए उस भवन में ऐसे पंचमुखी हनुमान जी का चित्र लगाना चाहिए, जिनका मुख उस जल स्रोत की ओर देखते हुए दक्षिण पश्चिम दिशा की तरफ हो। भवन की दीवारों में दरारें होना भी वास्तु दोष है। इसके कारण उस भवन में रहने वाले लोगों के जोड़ों में दर्द, गठिया, साइटिका, पीठ व गर्दन का दर्द होने का अंदेशा रहता है।इस वास्तु दोष के शमन के लिए दरारों को प्लास्टर कराकर बन्द कर देना चाहिए। यदि किसी कारण प्लास्टर कराना सम्भव न हो तो दरार को किसी झरने या पर्वत के पोस्टर द्वारा ढंक देना चाहिए। भवन के वास्तु दोषों को दूर करने के लिए भवन में तुलसी का पौधा, मनी प्लांट, अशोक वृक्ष, क्रिस्टल बॉल, विंड चाइम्स, मछली- घर आदि लगाना भी उचित माना गया है।

  • वास्तु अनुसार केसा हो

    वास्तु अनुसार केसा हो आपका विजिटिंग कार्ड -----
    विजिटिंग कार्ड के लिये वास्तुशास्त्र के नियम :-----

    मित्र, आज हम जानेंगे आपकी पहचान को बताने वाले आपके विजिटिंग कार्ड के बारे मे ...क्या आपकाविजिटिंगकार्- भी आपके व्यापार को , आपकी उन्नति को प्रभावित करते है ? जी हाँ , आइये जानते है की आपकी पहचान बताने वाले आपका विसिटिंग कार्ड किस तरफ से आपकी उन्नति को प्रभावित करता है ....
    मित्रो, आज की दूर संचार क्रान्ति में एक दुसरे से जान-पहचान तो है, परन्तु यह याद रख पाना कठिन है कि किससे कब और किस जगह मुलाकात हुयी थी। आज सम्पर्क को स्थायित्व एंव गतिशील बनाने के लिए विजिटिंग कार्ड का दौर चल रहा है।ऐसे में आपको यह सुनिश्चित करना है कि आपका विजिटिंग कार्ड कैसा हो? वास्तु के अनुसार यदि विजिटिंग कार्ड बनाया जाये तो, सम्पर्क और व्यवासय दोनों में प्रगतिशीलता कायम रहेगी।
    आइये आगे बढने से पहले यह समझ लेते है कि अपने विजिटिंग कार्ड को आप वास्तु की दिशाओं से कैसे जोड़ेंगे। आप अपने विजिटंग कार्ड को अपने सामने रखें, ऊपर की ओर पूर्व दिशा होगी, नीचे पश्चिम, दाएं दक्षिण और बाएं उत्तर।
    वर्तमान समय में जगत का विकास और प्रगति व्यवसायिक द्रष्टि बिंदु को आभारी है. व्यवसायिक क्षेत्र के विकास के लिये विजिटिंग कार्ड सब से महत्व का संपर्कसूत्र है. हर व्यक्ति या संस्था खुद की एक अलग पहेचान स्थापित करना चाहता है. और यह अलग पहेचान को सामनेवाली व्यक्ति के मानस पर असरकारक रुप से प्रभावित करने का श्रेष्ठ कार्य विजिटिंग कार्ड करता है.
    वास्तु शास्त्र में आपके रहने बसने की सुविधा के साथ साथ भवन में रखे जाने वाले आधुनिक यंत्र तथा व्यापार को प्रभावित करने वाले सभी साधनों का विशेष महत्व है.
    आधुनिक समय में व्यापार में विजिटिंग कार्डों का प्रचलन महत्वपूर्ण बन गया है। फलस्वरूप आधुनिक व्यापार विजिटिंग कार्डों के माध्यम से ही प्रभावित होने लगा है। इसीलिए यह आवश्यक है कि व्यापार में सफलता प्राप्त करने के लिए हमारा विजिटिंग कार्ड वास्तु के नियमानुकूल हो जिस से हमें सकारात्मक उर्जा प्राप्त हो सके ।
    यदि आपका विजिटिंग कार्ड वास्तु अनुकूल रंग एवं आकर्षित बना हुआ है तो निश्चय ही आपके व्यापार को बढावा मिलेगा.इसके विपरीत आकर्षण विहीन विजिटिंग कार्ड जो वास्तु के नियम विपरीत बना हुआ है धीरे धीरे निश्चय ही आप के व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव देगा तथा आपको व्यापार में असफलता का सामना करना पड़ेगा अतः यह नितांत आवश्यक है कि विजिटिंग कार्ड बनवाने से पहले वास्तु अनुसार उसमें अनुकूल रंग एवं डिजाईन कि जांच कर ली जाए।
    विजिटिंग कार्ड का आकार समकोण होना चाहिए। विषम कोण वाला विजिटिंग कार्ड सम्पर्क को अस्थायी एंव विवादग्रस्त बना सकता है और शीघ्र ही आपके सम्बन्ध टूट जायेंगे।विजिटिंग कार्ड में किस दिशा में क्या लिखवाया जाये, यह अधिक महत्वपूर्ण है। कार्ड के मध्य में ब्रहम स्थान से उपर आप-अपना नाम लिखा सकते हैं। मोबाइल नम्बर आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व के कोने पर अकिंत करें। अपने व्यवसाय व संस्थान का नाम व पूरा पता दक्षिण-पश्चिम के कोण यानि नैरित्य कोण पर लिखवाना चाहिए । क्योंकि नैऋत्य कोण स्थिरता व व्यापकता का प्रतीक माना जाता है।कार्ड के रंगों का चयन अपनी जन्मपत्री के अनुसार करना चाहिए।
    ट्रेडमार्क, मोनोग्राम, स्वास्तिक, कलश और गणपति आदि के लिए कार्ड का ईशान कोण अधिक शुभ माना जाता है। एक अच्छे विजिटिंग कार्ड के लिए कार्ड का मध्य क्षेत्र, जिसे वास्तु में ब्रहम स्थान कहा जाता है। उसे खाली रखना चाहिए। यह ध्यान रखे की एक सुन्दर और वास्तु के अनुसार डिजाईन किया हुआ विजिटिंग कार्ड आपके संपर्कों में मधुरता एंव व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण पैदा करता है।
    विजिटिंग कार्ड में किस दिशा में क्या लिखवाया जाये, यह अधिक महत्वपूर्ण है। कार्ड के मध्य में ब्रहम स्थान से उपर आप-अपना नाम लिखा सकते हैं। मोबाइल नम्बर आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व के कोने पर अकिंत करें। अपने व्यवसाय व संस्थान का नाम व पूरा पता दक्षिण-पूर्व के कोण पर डालें। क्योंकि नैऋत्य कोण स्थिरता व व्यापकता का प्रतीक माना जाता है।
    कार्ड के रंगों का चयन अपनी जन्मपत्री के अनुसार करना चाहिए। ट्रेडमार्क, मोनोग्राम, स्वास्तिक, कलश और गणपति आदि के लिए कार्ड का ईशान कोण अधिक शुभ माना जाता है। एक अच्छे विजिटिंग कार्ड के लिए कार्ड का मध्य क्षेत्र, जिसे वास्तु में ब्रहम स्थान कहा जाता है। उसे खाली रखना चाहिए। एक सुन्दर विजिटिंग कार्ड आपके संपर्कों में मधुरता एंव व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण पैदा करता है।
    वास्तु अनुसार विजिटिंग कार्ड इस प्रकार हो----
    -----आप का विजिटिंग कार्ड सुंदर एवं आकर्षक होना चाहिए इसके साथ साथ उसका चौरस होना तथा कटा-फटा ना होना भी अत्यन्त आवश्यक है।
    ------आप का कार्ड झुर्र्यिओं व सलवटों से रहित हो तथा उसके बीच का स्थान खली(रिक्त) होना चाहिए जिससे कि अनुकूल सकारात्मक उष्मा आप के व्यापार को मिलती रहे।
    ------- विजिटिंग कार्ड कि अनुकूलता के लिए उसके उत्तरी पूर्वी (ईशान) कोने पर अपने धरम अनुसार धार्मिक चिन्ह या राष्ट्रीय चिन्ह अंकित करना वास्तु नियमों के अंतर्गत माना गया है। जो हमें अच्छी सफलता प्रदान करता है।
    ------जहाँ तक फोन नुम्बरों का सवाल है जिससे हमारे व्यापारिक संपर्क बनते हैं उत्तर पश्चिम (व्यावय ) दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में वायु का प्रभाव अति तीव्र होने के कारण हमारे व्यापार में हमें अनुकूल प्रभाव मिलेंगे।
    ------विजिटिंग कार्ड का चुनाव करते समय यह आवश्यक है कि वह हलकी क्वालिटी का न हो ,पीले ,लाल व हरे रंग का विजिटिंग कार्ड वास्तु नियमों के अंतर्गत माना गया है।
    -------जहाँ तक आपका नाम व पता लिखने कि बात है उसे दक्षिण पश्चिम वाले कोने से लिखना अच्छा व वास्तु अनुकूल माना गया है।
    ---------अनुसार कार्ड के रंग का चुनाव कर सकते हैं .इसके साथ साथ कार्ड का आकर्षित होना तथा सुंदर लिखा जाना भी आवश्यक है।

    अत: वास्तुशास्त्र के नियम से विजिटिंग कार्ड को अलग अलग रुप से तैयार कीया जा सकता है. जैसे...
    01.--जन्म के चन्द्र की राशि के रंग के अनुरुप
    02.-- अंकशास्त्र के अनुरुप
    03.---जन्मकुंडली के प्रबल ग्रहो के रंग के अनुरुप
    04.---जन्मकुंडली में सूर्य की स्थिति के अनुरुप
    05.जन्मकुंडली के कर्मस्थान और भाग्यस्थान की स्थिति के अनुरुप
    06.--- नक्षत्र स्वामी के अनुरुप
    07.व्यक्ति या संस्था के प्रोफ़ेशन ( व्यवसाय ) के अनुरुप विजिटिंग कार्ड की रचना की जा सकती है.

    जानिए की आपके व्यवसाय अनुसार केसा हो आपके विजिटिंग कार्ड का रंग/कलर----
    व्यवसाय
    रंग
    एजेंट
    गेहरा हरा, एक से ज्यादा रंगो का मिश्रण
    ज्योतिष - वास्तु के जानकर
    हरा, आसमानी
    कंप्यूटर का काम करने वाले
    हल्का आसमानी, हरा, नारंगी
    डोक्टर
    सफ़ेद, हरा, गुलाबी, पीला, आईवरी
    वकील
    सफ़ेद, काला, पीला, आईवरी, आसमानी
    व्यापारी पेढी
    हरा, नीला
    बेंक-शेयर बाजार के लोग
    सफ़ेद, आसमानी, हरा, पीला
    ब्युटी पार्लर
    गेहरा रंग
    बिल्डर-कोन्ट्राक्- र
    सफ़ेद, हरा
    चार्टड एकाउन्टन्ट
    हल्का आसमानी, नीला, हरा
    ओफ़िस
    हल्का हरा, हल्का आसमानी, गुलाबी, आईवरी
    ईलेक्ट्रिक-ईलेक्ट- रोनीक्स
    सफ़ेद, पीला, लाल, गुलाबी, आसमानी
    बच्चो की वस्तुए
    गुलाबी, हल्का आसमानी, नीला, जामूनी, सफ़ेद
    ज्वेलर्स
    पीले को छोडकर चमकीले न हो ऐसे गेहरे रंग-आसमानी, कथ्थाई, लाल
    केमीस्ट
    हल्का आसमानी, गुलाबी
    रेडीमेईड स्टोर्स
    चमकीले रंग, आसमानी, सफ़ेद, हरा
    रेस्टोरन्ट-लोज
    पारदर्शक, केसरीया, नारंगी, हरा
    फ़ूटवेर
    श्याम, भूरा, लाल, सफ़ेद
    फ़र्नीचर-डेकोरेशन
    सफ़ेद, पिस्ता, क्रिम, आसमानी, नीला
    फ़लो की दुकान
    सफ़ेद, हरा, पीला, हल्के रंग
    ओटोमोबाईल्स-स्पेर- ार्ट्स-मीकेनीक
    आसमानी, कोफ़ी, जामूनी, गेहरा नीला
    शिक्षा विभाग
    केसरीया, पीला, सफ़ेद, आईवरी, आसमानी, हरा, पिस्ता
    कांच की वस्तुए
    पारदर्शक, सिल्वर, गेहरा आसमानी
    स्टेशनरी
    हरा, आसमानी, पीला
    प्रिन्टींग प्रेस
    हल्का हरा, हल्का आसमानी, गुलाबी, सफ़ेद

  • जानिए शक्र ग्रह को,शक्

    जानिए शक्र ग्रह को,शक्र का प्रभाव,महत्त्व एवं शुक्र को बलवान /बली बनाने के उपाय और टोटके----

    प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि असका जीवन सुखपूर्ण रहें, कभी किसी चीज की कमी न हो, सुन्दर घर, नोकर-चाकर, गाडिया, महंगा मोबाईन फोन हो, किसी को तो यह सुविधा जन्मजात ही नसीब होती है, किसी को मेहनत से प्राप्त होती है और किसी को प्राप्त ही नही होती हैं। ऐसा क्यों ? होता है, आइये जाने।

    ज्योतिष में शुक्र को स्त्री ग्रह माना गया है। शुक्र ग्रह से प्रभावित व्यक्ति सौम्य एवं अत्यंत सुंदर होते है। यदि किसी की कुंडली में शुक्र शुभ प्रभाव देता है तो वह जातक आकर्षक, सुंदर और मनमोहक होता है। शुक्र के विशेष प्रभाव से वह जीवनभर सुखी रहता है।

    शुक्र को पति-पत्नि, प्रेम संबंध, ऐश्वर्य, आनंद आदि का भी कारक ग्रह माना गया है। यदि आपकी कुंडली में शुक्र की स्थिति अच्छी है तो आपका पूरा जीवन भोग,आनंद और ऐश्वर्य के साथ बितता है। साथ ही दाम्पत्य जीवन सुख और प्रेम से भर जाता है।

    शुक्र अपने प्रभाव से व्यक्ति को मकान और वाहन आदि का भी सुख देता है। यदि आप चाहते है कि आपका भी दाम्पत्य जीवन प्रेम, आंनद और सुख से बीते तो, शुक्र के शुभफल देने वाले उपाय करें
    सम्पूर्ण भोग विलास की चीजों का क्षेत्राधिकार ग्रहो में शुक्र ग्रह को प्राप्त हैं, जनकी पत्रिका में ये शुभ भावगत, बली होते है, उन्हें उपरोक्त चीजों का सुख प्राप्त होता हैं। जिनकी पत्रिका में कमजोर होते हैं, उन्हें उपरोक्त चीजों का सुख प्राप्त नही होता हैं।

    शुक्र को सुन्दरता का प्रतीक माना जाता है। सुख का कारक माना जाता है। शुक्र की चमक एवं शान अन्य ग्रहो के अलग व निराली है। इसी सुन्दरता के लिए शुक्र जाना जाता है। शुक्र की आराधना कर शुक्र को बलवान बनाकर सुख व ऐश्वर्य पाया जा सकता है। आज हर व्यक्ति अपने जीवन को अपनी हैसियत से ज्यादा आरामदायक वस्तुओं पर खर्च करता है। यदि आप भी जिन्दगी को ऐश्वर्य और आराम से भरपुर बनाना चाहते हैं तो शुक्र बलवान बनाने वाले इन उपायों को अपनाए।

    ऐसा नही हैं कि कमजोर शुक्र को बली नही बनाया जा सकता हैं। शुक्र ही नही प्रत्येक ग्रह को बली बनाया जा सकता हैं। यहा हम शुक्र ग्रह को बली बनाने के उपाय के बारे में चर्चा करेंगे।
    ग्रहों में शुक्र को विवाह व वाहन का कारक ग्रह कहा गया है। शुक्र के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है।शुक्र के केंद्र में होने पर धनवान तथा विद्यावान होता है।

    ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक शुक्र का शुभ प्रभाव ही सांसारिक सुखों को नियत करता है। जैसे घर, वाहन, सुविधा। यह सहूलियत ही किसी भी व्यक्ति को मनचाहे लक्ष्य पाने में मदद करती है। वह उमंग और उत्साह से भरा होता है। इसी तरह शुक्र ग्रह यौन अंगों, रज और वीर्य का कारक भी है। जिससे वह किसी व्यक्ति में सुंदरता और शारीरिक सुख की ओर खिंचाव पैदा करता है।

    धर्म की भाषा में कहें तो शुक्र का शुभ होना चार पुरुषार्थ में एक काम को पाने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि कुण्डली में शुक्र के बली होने से व्यक्ति यौन सुख पाता है। वहीं कमजोर होने पर रज और वीर्य विकार से व्यक्ति का चेहरा तेजहीन और शरीर दुर्बल हो जाता है। शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह को शुभ और बली बनाने के लिए इस शुक्र मंत्र के जप का विधान बताया गया है ..हमारी कुंडली में शुक्र का विशेष स्थान रहता है। इसके शुभ प्रभाव से व्यक्ति सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है।

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    शुक्र की उत्पत्ति का पौराणिक वृत्तांत—–
    पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र भृगु ऋषि का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या ख्याति से हुआ जिस से धाता ,विधाता दो पुत्र व श्री नाम की कन्या का जन्म हुआ | भागवत पुराण के अनुसार भृगु ऋषि के कवि नाम के पुत्र भी हुए जो कालान्तर में शुक्राचार्य नाम से प्रसिद्ध हुए |
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    मृतसंजीवनी विद्या एवम ग्रहत्व की प्राप्ति—–

    महर्षि अंगिरा के पुत्र जीव तथा महर्षि भृगु के पुत्र कवि समकालीन थे |यज्ञोपवीत संस्कार के बाद दोनों ऋषियों की सहमति से अंगिरा ने दोनों बालकों की शिक्षा का दायित्व लिया |कवि महर्षि अंगिरा के पास ही रह कर अंगिरानंदन जीव के साथ ही विद्याध्ययन करने लगा |आरम्भ में तो सब सामान्य रहा पर बाद में अंगिरा अपने पुत्र जीव की शिक्षा कि ओर विशेष ध्यान देने लगे व कवि कि उपेक्षा करने लगे |कवि ने इस भेदभाव पूर्ण व्यवहार को जान कर अंगिरा से अध्ययन बीच में ही छोड़ कर जाने कि अनुमति ले ली और गौतम ऋषि के पास पहुंचे | गौतम ऋषि ने कवि कि सम्पूर्ण कथा सुन कर उसे महादेव कि शरण में जाने का उपदेश दिया |महर्षि गौतम के उपदेशानुसार कवि ने गोदावरी के तट पर शिव की क�� िन आराधना की | स्तुति व आराधना से प्रसन्न हो कर महादेव ने कवि को देवों को भी दुर्लभ मृतसंजीवनी नामक विद्याप्रदान की तथा कहा की जिस मृत व्यक्ति पर तुम इसका प्रयोग करोगे वह जीवित हो जाएगा | साथ ही ग्रहत्व प्रदान करते हुए भगवान शिव ने कहा कि आकाश में तुम्हारा तेज सब नक्षत्रों से अधिक होगा |तुम्हारे उदित होने पर ही विवाह आदि शुभ कार्य आरम्भ किये जायेंगे | अपनी विद्या से पूजित होकर भृगु नंदन शुक्र दैत्यों के गुरु पद पर नियुक्त हुए | जिन अंगिरा ऋषि ने उन के साथ उपेक्षा पूर्ण व्यवहार किया था उन्हीं के पौत्र जीव पुत्र कच को संजीवनी विद्या देने में शुक्र ने किंचित भी संकोच नहीं किया |
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    कवि को शुक्र नाम कैसे मिला —–

    शुक्राचार्य कवि या भार्गव के नाम से प्रसिद्ध थे | इनको शुक्र नाम कैसे और कब मिला इस विषय में वामन पुराण में कहा गया है |
    दानवराज अंधकासुर और महादेव के मध्य घोर युद्ध चल रहा था | अन्धक के प्रमुख सेनानी युद्ध में मारे गए पर भार्गव ने अपनी संजीवनी विद्या से उन्हें पुनर्जीवित कर दिया | पुनः जीवित हो कर कुजम्भ आदि दैत्य फिर से युद्ध करने लगे | इस पर नंदी आदि गण महादेव से कहने लगे कि जिन दैत्यों को हम मार गिराते हैं उन्हें दैत्य गुरु संजीवनी विद्या से पुनः जीवित कर देते हैं , ऐसे में हमारे बल पौरुष का क्या महत्व है | यह सुन कर महादेव ने दैत्य गुरु को अपने मुख से निगल कर उदरस्थ कर लिया | उदर में जा कर कवि ने शंकर कि स्तुति आरम्भ कर दी जिस से प्रसन्न हो कर शिव ने उन को बाहर निकलने कि अनुमति दे दी | भार्गव श्रेष् एक दिव्य वर्ष तक महादेव के उदर में ही विचरते रहे पर कोई छोर न मिलने पर पुनः शिव स्तुति करने लगे | बार बार प्रार्थना करने पर भगवान शंकर ने हंस कर कहा कि मेरे उदर में होने के कारण तुम मेरे पुत्र हो गए हो अतः मेरे शिश्न से बाहर आ जाओ | आज से समस्त चराचर जगत में तुम शुक्र के नाम से ही जाने जाओगे | शुक्रत्व पा कर भार्गव भगवान शंकर के शिश्न से निकल आये और दैत्य सेना कि और प्रस्थान कर गए | तब से कवि शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए |ज्योतिष शास्त्र में शुक्र का कारक भी शुक्र ग्रह को ही माना जाता है |
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    ज्योतिष शास्त्र में शुक्र का स्वरूप एवम प्रकृति——-

    प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शुक्र सुन्दर ,वात –कफ प्रधान , अम्लीय रूचि वाला ,सुख में आसक्त , सौम्य दृष्टि,वीर्य से पुष्ट ,रजोगुणी ,आराम पसंद, काले घुंघराले केशों वाला ,कामुक,सांवले रंग का तथा जल तत्व पर अधिकार रखने वाला है |शुक्र एक नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। शुक्र मीन राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं जो बृहस्पति के स्वामित्व में आने वाली एक जल राशि है।
    मीन राशि में स्थित शुक्र को उच्च का शुक्र भी कहा जाता है। मीन राशि के अतिरिक्त शुक्र वृष तथा तुला राशि में स्थित होकर भी बलशाली हो जाते हैं जो कि इनकी अपनी राशियां हैं। कुंडली में शुक्र का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को शारीरिक रूप से सुंदर और आकर्षक बना देता है तथा उसकी इस सुंदरता और आकर्षण से सम्मोहित होकर लोग उसकी ओर खिंचे चले आते हैं तथा विशेष रूप से विपरीत लिंग के लोग। शुक्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक शेष सभी ग्रहों के जातकों की अपेक्षा अधिक सुंदर होते हैं। शुक्र के प्रबल प्रभाव वालीं महिलाएं अति आकर्षक होती हैं तथा जिस स्थान पर भी ये जाती हैं, पुरुषों की लंबी कतार इनके पीछे पड़ जाती है। शुक्र के जातक आम तौर पर फैशन जगत, सिनेमा जगत तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में सफल होते हैं जिनमें सफलता पाने के लिए शारीरिक सुंदरता को आवश्यक माना जाता है। भारतीय वैदिक ज्योतिष में शुक्र को मुख्य रूप से पति या पत्नी अथवा प्रेमी या प्रेमिका का कारक माना जाता है। कुंडली धारक के दिल से अर्थात प्रेम संबंधों से जुड़ा कोई भी मामला देखने के लिए कुंडली में इस ग्रह की स्थिति देखना अति आवश्यक हो जाता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए। शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार, नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिज़ाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।
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    कब देंगे शक्र देव अपना प्रभाव—-
    कुण्‍डली में नौ ग्रह अपना समय आने पर पूरा प्रभाव दिखाते हैं। वैसे अपनी दशा और अन्‍तरदशा के समय तो ये ग्रह अपने प्रभाव को पुष्‍ट करते ही हैं लेकिन 22 वर्ष की उम्र से इन ग्रहों का विशेष प्रभाव दिखाई देना शुरू होता है। जातक की कुण्‍डली में उस दौरान भले ही किसी अन्‍य ग्रह की दशा चल रही हो लेकिन उम्र के अनुसार ग्रह का भी अपना प्रभाव जारी रहता है।25 से 28 वर्ष – यह शुक्र का काल है। इस काल में जातक में कामुकता बढती है। शुक्र चलित लोगों के लिए स्‍वर्णिम काल होता है और गुरू और मंगल चलित लोगों के लिए कष्‍टकारी। मंगल प्रभावी लोग काम से पीडित होते हैं और शुक्र वाले लोगों को अपनी वासनाएं बढाने का अवसर मिलता है। इस दौरान जो लव मैरिज होती है उसे टिके रहने की संभावना अन्‍य कालों की तुलना में अधिक होती है। शादी के लिहाज से भी इसे उत्‍तम काल माना जा सकता है।
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    शुक्र का रथ एवम गति —-
    श्री गरुड़ पुराण के अनुसार शुक्र का रथ सैन्य बल से युक्त,अनुकर्ष,ऊँचे- शिखर वाला ,तरकश व ऊँची पताका से युक्त है |
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    वैज्ञानिक परिचय——-
    शुक्र पृथ्वी का निकटतम ग्रह, सूर्य से दूसरा और सौरमण्डल का छ�� वाँ सबसे बड़ा ग्रह है। शुक्र पर कोई चुम्बकीय क्षेत्र नहीं है। इसका कोई उपग्रह भी नहीं है | यह आकाश में सबसे चमकीला पिंड है जिसे नंगी आँखों से भी देखा जा सकता है | शुक्र भी बुध की तरह एक आंतरिक ग्रह है, यह भी चन्द्रमा की तरह कलाये प्रदर्शित करता है। यह सूर्य की परिक्रमा 224 दिन में करता है और सूर्य से इसका परिक्रमा पथ 108200000 किलोमीटर लम्बा है। शुक्र ग्रह व्यास 121036 किलोमीटर और इसकी कक्षा लगभग वृत्ताकार है। यह अन्य ग्रहों के विपरीत दक्षिणावर्त ( Anticlockwise ) चक्रण करता है। ग्रीक मिथको के अनुसार शुक्र ग्रह प्रेम और सुंदरता की देवी है। 1962 में शुक्र ग्रह की यात्रा करने वाला पहला अंतरिक्ष यान मैरीनर 2 था। उसके बाद 20 से ज़्यादा शुक्र ग्रह की यात्रा पर जा चुके हैं; जिसमे पायोनियर, वीनस और सोवियत यान वेनेरा 7 है जो कि किसी दूसरे ग्रह पर उतरने वाला पहला यान था।
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    ज्योतिष शास्त्र में शुक्र———
    ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को शुभ ग्रह माना गया है | ग्रह मंडल में शुक्र को मंत्री पद प्राप्त है| यह वृष और तुला राशियों का स्वामी है |यह मीन राशि में उच्च का तथा कन्या राशि में नीच का माना जाता है | तुला 20 अंश तक इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |शुक्र अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को शुभकारक कहा गया है |जनम कुंडली में शुक्र सप्तम भाव का कारक होता है |शुक्र की सूर्य -चन्द्र से शत्रुता , शनि – बुध से मैत्री और गुरु – मंगल से समता है | यह स्व ,मूल त्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में ,शुक्रवार में , राशि के मध्य में ,चन्द्र के साथ रहने पर , वक्री होने पर ,सूर्य के आगे रहने पर ,वर्गोत्तम नवमांश में , अपरान्ह काल में ,जन्मकुंडली के तीसरे ,चौथे, छटे ( वैद्यनाथ छटे भाव में शुक्र को निष्फल मानते हैं ) व बारहवें भाव में बलवान व शुभकारक होता है | शुक्र कन्या राशि में स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर भी शुक्र बलहीन हो जाते हैं। शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन अथवा प्रेम संबंधों में समस्याएं पैदा कर सकता है। महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन प्रणाली को कमजोर कर सकता है तथा उनके रक्तस्त्राव , गर्भाशय अथवा अंडाशय पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण उन्हें संतान पैदा करनें में परेशानियां आ सकतीं हैं। शुक्र शारीरिक सुखों के भी कारक होते हैं तथा संभोग से लेकर हार्दिक प्रेम तक सब विषयों को जानने के लिए कुंडली में शुक्र की स्थिति महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

    शुक्र का प्रबल प्रभाव जातक को रसिक बना देता है तथा आम तौर पर ऐसे जातक अपने प्रेम संबंधों को लेकर संवेदनशील होते हैं। शुक्र के जातक सुंदरता और एश्वर्यों का भोग करने में शेष सभी प्रकार के जातकों से आगे होते हैं। शरीर के अंगों में शुक्र जननांगों के कारक होते हैं तथा महिलाओं के शरीर में शुक्र प्रजनन प्रणाली का प्रतिनिधित्व भी करते हैं तथा महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर किसी बुरे ग्रह का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए। शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार, नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिजाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।

    कारकत्व—-
    प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शुक्र स्त्री ,,काम सुख,भोग –विलास, वाहन,सौंदर्य ,काव्य रचना ,गीत –संगीत-नृत्य ,विवाह ,वशीकरण ,कोमलता,जलीय स्थान ,अभिनय ,श्वेत रंग के सभी पदार्थ ,चांदी,बसंत ऋतु ,शयनागार , ललित कलाएं,आग्नेय दिशा ,लक्ष्मी की उपासना ,वीर्य ,मनोरंजन ,हीरा ,सुगन्धित पदार्थ,अम्लीय रस और वस्त्र आभूषण इत्यादि का कारक है |

    रोग —–
    जन्म कुंडली में शुक्र अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे -आ�� वें -बारहवें भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो नेत्र रोग, गुप्तेन्द्रीय रोग,वीर्य दोष से होने वाले रोग , प्रोस्ट्रेट ग्लैंड्स, प्रमेह,मूत्र विकार ,सुजाक , कामान्धता,श्वेत या रक्त प्रदर ,पांडु इत्यादि रोग उत्पन्न करता है |कुंडली में शुक्र पर अशुभ राहु का विशेष प्रभाव जातक के भीतर शारीरिक वासनाओं को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है जिसके चलते जातक अपनी बहुत सी शारीरिक उर्जा तथा पैसा इन वासनाओं को पूरा करने में ही गंवा देता है जिसके कारण उसकी सेहत तथा प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा कुछेक मामलों में तो जातक किसी गुप्त रोग से पीड़ित भी हो सकता है जो कुंडली के दूसरे ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करते हुए जानलेवा भी साबित हो सकता है।
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    फल देने का समय—-
    शुक्र अपना शुभाशुभ फल 25 से 28 वर्ष कि आयु में ,अपने वार व होरा में ,बसंत ऋतु में,अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है | तरुणावस्था पर भी इस का अधिकार कहा गया है |
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    ज्योतिषानुसार बारह भावों में शुक्र के द्वारा दिये जाने वाले फ़ल---

    प्रथम भाव में शुक्र---
    जातक के जन्म के समय लगन में विराजमान शुक्र को पहले भाव में शुक्र की उपाधि दी गयी है। पहले भाव में शुक्र के होने से जातक सुन्दर होता है,और शुक्र जो कि भौतिक सुखों का दाता है,जातक को सुखी रखता है,शुक्र दैत्यों का राजा है इसलिये जातक को भौतिक वस्तुओं को प्रदान करता है,और जातक को शराब कबाब आदि से कोई परहेज नही होता है,जातक की रुचि कलात्मक अभिव्यक्तियों में अधिक होती है,वह सजाने और संवरने वाले कामों में दक्ष होता है,जातक को राज कार्यों के करने और राजकार्यों के अन्दर किसी न किसी प्रकार से शामिल होने में आनन्द आता है,वह अपना हुकुम चलाने की कला को जानता है,नाटक सिनेमा और टीवी मीडिया के द्वारा अपनी ही बात को रखने के उपाय करता है,अपनी उपभोग की क्षमता के कारण और रोगों पर जल्दी से विजय पाने के कारण अधिक उम्र का होता है,अपनी तरफ़ विरोधी आकर्षण होने के कारण अधिक कामी होता है,और काम सुख के लिये उसे कोई विशेष प्रयत्न नही करने पडते हैं।

    द्वितीय भाव में शुक्र—
    दूसरा भाव कालपुरुष का मुख कहा गया है,मुख से जातक कलात्मक बात करता है,अपनी आंखों से वह कलात्मक अभिव्यक्ति करने के अन्दर माहिर होता है,अपने चेहरे को सजा कर रखना उसकी नीयत होती है,सुन्दर भोजन और पेय पदार्थों की तरफ़ उसका रुझान होता है,अपनी वाकपटुता के कारण वह समाज और जान पहिचान वाले क्षेत्र में प्रिय होता है,संसारिक वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अपनी समझने की कला से पूर्ण होने के कारण वह विद्वान भी माना जाता है,अपनी जानपहिचान का फ़ायदा लेने के कारण वह साहसी भी होता है,लेकिन अकेला फ़ंसने के समय वह अपने को नि:सहाय भी पाता है,खाने पीने में साफ़सफ़ाई रखने के कारण वह अधिक उम्र का भी होता है।

    तीसरे भाव में शुक्र—
    तीसरे भाव में शुक्र के होने पर जातक को अपने को प्रदर्शित करने का चाव बचपन से ही होता है,कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार तीसरा भाव दूसरों को अपनी कला या शरीर के द्वारा कहानी नाटक और सिनेमा टीवी मीडिया के द्वारा प्रदर्शित करना भी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक अधिकतर नाटकबाज होते है,और किसी भी प्रकार के संप्रेषण को आसानी से व्यक्त कर सकते है,वे फ़टाफ़ट बिना किसी कारण के रोकर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के हंस कर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के गुस्सा भी कर सकते है,यह उनकी जन्म जात सिफ़्त का उदाहरण माना जा सकता है। अधिकतर महिला जातकों में तीसरे भाव का शुक्र बडे भाई की पत्नी के रूप में देखा जाता है,तीसरे भाव के शुक्र वाला जातक खूबशूरत जीवन साथी का पति या पत्नी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक को जीवन साथी बदलने में देर नही लगती है,चित्रकारी करने के साथ वह अपने को भावुकता के जाल में गूंथता चला जाता है,और उसी भावुकता के चलते वह अपने को अन्दर ही अन्दर जीवन साथी के प्रति बुरी भावना पैदा कर लेता है,अक्सर जीवन की अभिव्यक्तियों को प्रसारित करते करते वह थक सा जाता है,और इस शुक्र के धारक जातक आलस्य की तरफ़ जाकर अपना कीमती समय बरबाद कर लेते है,तीसरे शुक्र के कारण जातक के अन्दर चतुराई की मात्रा का प्रभाव अधिक हो जाता है,आलस्य के कारण जब वह किसी गंभीर समस्या को सुलझाने में असमर्थ होता है,तो वह अपनी चतुराई से उस समस्या को दूर करने की कोशिश करता है।

    चौथे भाव में शुक्र—
    चौथे भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार चन्द्रमा की कर्क राशि में होता है,जातक के अन्दर मानसिक रूप से कामवासना की अधिकता होती है,उसे ख्यालों में केवल पुरुष को नारी और नारी को पुरुष का ही क्याल रहता है,जातक आस्तिक भी होता है,परोपकारी भी होता है,लेकिन परोपकार के अन्दर स्त्री को पुरुष के प्रति और पुरुष को स्त्री के प्रति आकर्षण का भाव देखा जाता है,जातक व्यवहार कुशल भी होता है,और व्यवहार के अन्दर भी शुक्र का आकर्षण मुख्य होता है,जातक का स्वभाव और भावनायें अधिक मात्रा में होती है,वह अपने को समाज में वाहनो से युक्त सजे हुये घर से युक्त और आभूषणों से युक्त दिखाना चाहता है,अधिकतर चौथे शुक्र वाले जातकों की रहने की व्यवस्था बहुत ही सजावटी देखी जाती है,चौथे भाव के शुक्र के व्यक्ति को फ़ल और सजावटी खानों का काम करने से अच्छा फ़ायदा होता देखा गया है,पानी वाली जमीन में या रहने वाले स्थानों के अन्दर पानी की सजावटी क्रियायें पानी वाले जहाजों के काम आदि भी देखे जाते है,धनु या वृश्चिक का शुक्र अगर चौथे भाव में विराजमान होता है,तो जातक को हवाई जहाजों के अन्दर और अंतरिक्ष के अन्दर भी सफ़ल होता देखा गया है।

    पंचम भाव में शुक्र—
    पंचम भाव का शुक्र कविता करने के लिये अधिक प्रयुक्त माना जाता है,चन्द्रमा की राशि कर्क से दूसरा होने के कारण जातक भावना को बहुत ही सजा संवार कर कहता है,उसके शब्दों के अन्दर शैरो शायरी की पुटता का महत्व अधिक रूप से देखा जाता है,अपनी भावना के चलते जातक पूजा पाठ से अधिकतर दूर ही रहता है,उसे शिक्षा से लेकर अपने जीवन के हर पहलू में केवल भौतिकता का महत्व ही समझ में आता है,व्ह जो सामने है,उसी पर विश्वास करना आता है,आगे क्या होगा उसे इस बात का ख्याल नही आता है,वह किसी भी तरह पराशक्ति को एक ढकोसला समझता है,और अक्सर इस प्रकार के लोग अपने को कम्प्यूटर वाले खेलों और सजावटी सामानों के द्वारा धन कमाने की फ़िराक में रहते है,उनको भगवान से अधिक अपने कलाकार दिमाग पर अधिक भरोशा होता है,अधिकतर इस प्रकार के जातक अपनी उम्र की आखिरी मंजिल पर किसी न किसी कारण अपना सब कुछ गंवाकर भिखारी की तरह का जीवन निकालते देखे गये है,उनकी औलाद अधिक भौतिकता के कारण मानसिकता और रिश्तों को केवल संतुष्टि का कारण ही समझते है,और समय के रहते ही वे अपना मुंह स्वाभाविकता से फ़ेर लेते हैं।

    छठे भाव में शुक्र—
    छठे भाव को कालपुरुष के अनुसार बुध का घर माना जाता है,और कन्या राशि का प्रभाव होने के कारण शुक्र इस स्थान में नीच का माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र वाले जातकों के जीवन साथी मोटे होते है,और आराम तलब होने के कारण छठे शुक्र वालों को अपने जीवन साथी के सभी काम करने पडते है,इस भाव के जातकों के जीवन साथी किसी न किसी प्रकार से दूसरे लोगों से अपनी शारीरिक काम संतुष्टि को पूरा करने के चक्कर में केवल इसी लिये रहते है,क्योंकि छठे शुक्र वाले जातकों के शरीर में जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी हमेशा बनी रहती है,चिढचिढापन और झल्लाहट के प्रभाव से वे घर या परिवार के अन्दर एक प्रकार से क्लेश का कारण भी बन जाते है,शरीर में शक्ति का विकास नही होने से वे पतले दुबले शरीर के मालिक होते है,यह सब उनकी माता के कारण भी माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र के जातकों की माता सजने संवरने और अपने को प्रदर्शित करने के चक्कर में अपने जीवन के अंतिम समय तक प्रयासरत रहतीं है। पिता के पास अनाप सनाप धन की आवक भी रहती है,और छठे शुक्र के जातकों के एक मौसी की भी जीवनी उसके लिये महत्वपूर्ण होती है,माता के खानदान से कोई न कोई कलाकार होता है, या मीडिया आदि में अपना काम कर रहा होता है।

    सप्तम भाव में शुक्र—
    सप्तम भाव में शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार अपनी ही राशि तुला में होता है,इस भाव में शुक्र जीवन साथी के रूप में अधिकतर मामलों में तीन तीन प्रेम सम्बन्ध देने का कारक होता है,इस प्रकार के प्रेम सम्बन्ध उम्र की उन्नीसवीं साल में,पच्चीसवीं साल में और इकत्तीसवीं साल में शुक्र के द्वारा प्रदान किये जाते है,इस शुक्र का प्रभाव माता की तरफ़ से उपहार में मिलता है,माता के अन्दर अति कामुकता और भौतिक सुखों की तरफ़ झुकाव का परिणाम माना जाता है,पिता की भी अधिकतर मामलों में या तो शुक्र वाले काम होते है,अथवा पिता की भी एक शादी या तो होकर छूट गयी होती है,या फ़िर दो सम्बन्ध लगातार आजीवन चला करते है,सप्तम भाव का शुक्र अपने भाव में होने के कारण महिला मित्रों को ही अपने कार्य के अन्दर भागीदारी का प्रभाव देता है। पुरुषों को सुन्दर पत्नी का प्रदायक शुक्र पत्नी को अपने से नीचे वाले प्रभावों में रखने के लिये भी उत्तरदायी माना जाता है,इस भाव का शुक्र उदारता वाली प्रकृति भी रखता है,अपने को लोकप्रिय भी बनाता है,लेकिन लोक प्रिय होने में नाम सही रूप में लिया जाये यह आवश्यक नही है,कारण यह शुक्र कामवासना की अधिकता से व्यभिचारी भी बना देता है,और दिमागी रूप से चंचल भी बनाता है,विलासिता के कारण जातक अधिकतर मामलों में कर्म हीन होकर अपने को उल्टे सीधे कामों मे लगा लेते है।

    आठवें भाव में शुक्र—
    आठवें भाव का शुक्र जातक को विदेश यात्रायें जरूर करवाता है,और अक्सर पहले से माता या पिता के द्वारा सम्पन्न किये गये जीवन साथी वाले रिस्ते दर किनार कर दिये जाते है,और अपनी मर्जी से अन्य रिस्ते बनाकर माता पिता के लिये एक नई मुसीबत हमेशा के लिये खडी कर दी जाती है। जातक का स्वभाव तुनक मिजाज होने के कारण माता के द्वारा जो शिक्षा दी जाती है वह समाज विरोधी ही मानी जाती है,माता के पंचम भाव में यह शुक्र होने के कारण माता को सूर्य का प्रभाव देता है,और सूर्य शुक्र की युति होने के कारण वह या तो राजनीति में चली जाती है,और राजनीति में भी सबसे नीचे वाले काम करने को मिलते है,जैसे साफ़ सफ़ाई करना आदि,माता की माता यानी जातक की नानी के लिये भी यह शुक्र अपनी गाथा के अनुसार वैध्वय प्रदान करता है,और उसे किसी न किसी प्रकार से शिक्षिका या अन्य पब्लिक वाले कार्य भी प्रदान करता है,जातक को नानी की सम्पत्ति बचपन में जरूर भोगने को मिलती है,लेकिन बडे होने के बाद जातक मंगल के घर में शुक्र के होने के बाद या तो मिलट्री में जाता है,या फ़िर किसी प्रकार की सजावटी टेकनोलोजी यानी कम्प्यूटर और अन्य आई टी वाली टेकनोलोजी में अपना नाम कमाता है। लगातार पुरुष वर्ग कामुकता की तरफ़ मन लगाने के कारण अक्सर उसके अन्दर जीवन रक्षक तत्वों की कमी हो जाती है,और वह रोगी बन जाता है,लेकिन रोग के चलते यह शुक्र जवानी के अन्दर किये गये कामों का फ़ल जरूर भुगतने के लिये जिन्दा रखता है,और किसी न किसी प्रकार के असाध्य रोग जैसे तपेदिक या सांस की बीमारी देता है,और शक्तिहीन बनाकर बिस्तर पर पडा रखता है। इस प्रकार के पुरुष वर्ग स्त्रियों पर अपना धन बरबाद करते है,और स्त्री वर्ग आभूषणो और मनोरंजन के साधनों तथा महंगे आवासों में अपना धन व्यय करती है।

    नवें भाव का शुक्र—
    नवें भाव का मालिक कालपुरुष के अनुसार गुरु होता है,और गुरु के घर में शुक्र के बै�� जाने से जातक के लिये शुक्र धन लक्ष्मी का कारक बन जाता है,उसके पास बाप दादा के जमाने की सम्पत्ति उपभोग करने के लिये होती है,और शादी के बाद उसके पास और धन बढने लगता है,जातक की माता को जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी होती है,और पिता को मोटापा यह शुक्र उपहार में प्रदान करता है,बाप आराम पसंद भी होता है,बाप के रहते जातक के लिये किसी प्रकार की धन वाली कमी नही रहती है,वह मनचाहे तरीके से धन का उपभोग करता है,इस प्रकार के जातकों का ध्यान शुक्र के कारण बडे रूप में बैंकिंग या धन को धन से कमाने के साधन प्रयोग करने की दक्षता ईश्वर की तरफ़ से मिलती है,वह लगातार किसी न किसी कारण से अपने को धनवान बनाने के लिये कोई कसर नही छोडता है। उसके बडे भाई की पत्नी या तो बहुत कंजूस होती है,या फ़िर धन को समेटने के कारण वह अपने परिवार से बिलग होकर जातक का साथ छोड देती है,छोटे भाई की पत्नी भी जातक के कहे अनुसार चलती है,और वह हमेशा जातक के लिये भाग्य बन कर रहती है,नवां भाव भाग्य और धर्म का माना जाता है,जातक के लिये लक्ष्मी ही भगवान होती है,और योग्यता के कारण धन ही भाग्य होता है। जातक का ध्यान धन के कारण उसकी रक्षा करने के लिये भगवान से लगा रहता है,और वह केवल पूजा पा�� केवल धन को कमाने के लिये ही करता है। सुखी जीवन जीने वाले जातक नवें शुक्र वाले ही देखे गये है,छोटे भाई की पत्नी का साथ होने के कारण छोटा भाई हमेशा साथ रहने और समय समय पर अपनी सहायता देने के लिये तत्पर रहता है।

    दशम भाव का शुक्र—-
    दसम भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार शनि के घर में विराजमान होता है,पिता के लिये यह शुक्र माता से शासित बताया जाता है,और माता के लिये पिता सही रूप से किसी भी काम के अन्दर हां में हां मिलाने वाला माना जाता है।छोटा भी कुकर्मी बन जाता है,और बडा भाई आरामतलब बन जाता है। जातक के पास कितने ही काम करने को मिलते है,और बहुत सी आजीविकायें उसके आसपास होती है। अक्सर दसवें भाव का शुक्र दो शादियां करवाता है,या तो एक जीवन साथी को भगवान के पास भेज देता है,अथवा किसी न किसी कारण से अलगाव करवा देता है। जातक के लिये एक ही काम अक्सर परेशान करने वाला होता है,कि कमाये हुये धन को वह शनि वाले नीचे कामों के अन्दर ही व्यय करता है,इस प्रकार के जातक दूसरों के लिये कार्य करने के लिये साधन जुटाने का काम करते है,दसवें भाव के शुक्र वाले जातक महिलाओं के लिये ही काम करने वाले माने जाते है,और किसी न किसी प्रकार से घर को सजाने वाले कलाकारी के काम,कढाई कशीदाकारी,पत्थरों को तरासने के काम आदि दसवें भाव के शुक्र के जातक के पास करने को मिलते है।

    ग्यारहवें भाव का शुक्र—-
    ग्यारहवां भाव संचार के देवता यूरेनस का माना जाता है,आज के युग में संचार का बोलबाला भी है,मीडिया और इन्टरनेट का कार्य इसी शुक्र की बदौलत फ़लीभूत माना जाता है,इस भाव का शुक्र जातक को विजुअल साधनों को देने में अपनी महारता को दिखाता है,जातक फ़िल्म एनीमेशन कार्टून बनाना कार्टून फ़िल्म बनाना टीवी के लिये काम करना,आदि के लिये हमेशा उत्साहित देखा जा सकता है। जातक के पिता की जुबान में धन होता है,वह किसी न किसी प्रकार से जुबान से धन कमाने का काम करता है,जातक का छोटा भाई धन कमाने के अन्दर प्रसिद्ध होता है,जातक की पत्नी अपने परिवार की तरफ़ देखने वाली होती है,और जातक की कमाई के द्वारा अपने मायके का परिवार संभालने के काम करती है। जातक का बडा भाई स्त्री से शासित होता है,जातक के बडी बहिन होती है,और वह भी अपने पति को शासित करने में अपना गौरव समझती है। जातक को जमीनी काम करने का शौक होता है,वह खेती वाली जमीनों को सम्भालने और दूध के काम करने के अन्दर अपने को उत्साहित पाता है,जातक की माता का स्वभाव भी एक प्रकार से ह�� ीला माना जाता है,वह धन की कीमत को नही समझती है,और माया नगरी को राख के ढेर में बदलने के लिये हमेशा उत्सुक रहती

  • जानिए श्रीकृष्ण जन्मा

    जानिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व को ...!!!
    क्यों और केसे मनाये यह पावन श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार ...???

    इस जन्माष्टमी पर बना अद्भुत ग्रह योग----

    इस वर्ष जन्माष्टमी के दिन तिथि, नक्षत्र एवं वार का संयोग ऐसा बन रहा है जैसे भगवान श्री कृष्ण के जन्म के समय बना था। भगवान कृष्ण के जन्म के समय जितने योग थे वे सभी इस बार जन्माष्टमी (28 अगस्त) पर बन रहे हैं। पंडितों के अनुसार भाद्रमास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग, वृषभ लग्न और उच्च राशि का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य इन सभी योग में श्रीकृष्ण प्राकट्य हुए थे। पंडित इसे अच्छा मान रहे हैं।
    लेकिन कुण्डली में ग्रहों की स्थिति कृष्ण जन्म के समान नहीं है। फिर भी इस दिन जन्म लेने वाले बच्चे बुद्घिमान और ज्ञानी होंगे। आर्थिक मामलों में संपन्न एवं कूटनीतिक विषयों के जानकार रहेंगे। ज्योतिषीय गणना के अनुसार करीब 5057 साल बाद इस तरह का योग बना है।

    जन्माष्टमी पर्व कृष्ण की उपासना का पर्व है। इस अवसर पर हम कृष्ण के बाल रूप की वंदना करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। कृष्ण के बाल रूप से लेकर उनका पूरा जीवन कर्म की प्रधानता को ही लक्षित करता है। अपने मामा कंस का वध कर कृष्ण ने यह उदाहरण पेश किया कि रिश्तों से बड़ा कर्तव्य होता है। कर्तव्य परायणता की यही सीख कृष्ण ने रणभूमि में अर्जुन को भी दी जो अपनों के निर्बाध वध से आहत होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो चले थे। गीता आज भी हमारे धर्मग्रंथों में सर्वोत्तम ग्रंथ है जो जीवन के झंझावात में, आपके हर सवाल का जवाब देती है। कृष्ण हमारी तमाम अन्य धार्मिक उपासनाओं से इस प्रकार अलग हैं कि कृष्ण के उपदेश आज के व्यावहारिक जीवन के अनुरूप और व्यावहारिक लगते हैं।

    जन्‍माष्‍टमी के त्‍यौहार में भगवान विष्‍णु की, श्री कृष्‍ण के रूप में, उनकी जयन्‍ती के अवसर पर प्रार्थना की जाती है. हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के असुर राजा कंस का अंत करने के लिए हुआ था. कृष्ण ने ही संसार को “गीता” का ज्ञान भी दिया जो हर इंसान को भय मुक्त रहने का मंत्र देती है. इस उत्सव में कृष्‍ण के जीवन की घटनाओं की याद को ताजा करने व राधा जी के साथ उनके प्रेम का स्‍मरण करने के लिए रास लीला की जाती है.

    जब-जब असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। चूँकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी अथवा जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष रात्रि बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झाँकियाँ सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है।

    जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर पुरूष व औरतें उपवास व प्रार्थना करते हैं. मन्दिरों व घरों को सुन्‍दर ढंग से सजाया जाता है. इस दिन जगह-जगह आपको झांकियां और कृष्ण-लीलाएं देखने को मिलेंगी.

    जन्माष्टमी का यह पावन पर्व/त्यौहार देश के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है. मथुरा, वृदांवन और यूपी में आपको इस दिन कृष्ण-लीलाएं और रास-लीलाएं देखने को मिलेंगी तो वहीं महाराष्ट्र में मटकी-फोड़ने का विधान है. कृष्ण को लीलाओं का सरताज माना जाता है, उनका पूरा बचपन विभिन्न लीलाओं से भरा हुआ है. इसीलिए इस दिन झांकियों के द्वारा लोग उनके बाल जीवन को प्रदर्शित करने की कोशिश करते हैं.

    यह हें श्री कृष्ण की जन्मकुंडली और उसके योग----
    श्रीकृष्ण का जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगन में हुआ था। उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लगन में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठे भाव में शुक्र और शनि बैठे हैं।

    जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु बैठे हैं। कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में हैं। कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव की कुंडली है।

    कृष्ण नाम किसने दिया..????
    महामुनि गर्ग ने इऩका यशोदा के लल्ला का नाम ‘कृष्ण’ रखा। और कहा कि इनकी जन्म कुंडली में चन्द्र, मंगल, बुध और शनि उच्च राशिगत हैं तथा सूर्य, गुरु एवं शुक्र अपनी-अपनी राशि में बैठे हैं। चंद्रमा के साथ केतु की युती से केतु पापरहित हो गया हैं, लेकिन राहू दोष युक्त होकर पत्नी स्थान में बैठे हैं। राहू सप्तम भाव में हो तो विवाहेतर संबंध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

    सप्तम राहू के प्रभाव से उन पर हजारों स्त्रियों के पति होने के आरोप लगते रहे हैं। यह सत्य से परे है। इनकी कुंडली में लग्न में उच्च राशिगत चंद्र के द्ववारा ‘मृदंग योग’ बनने के फलस्वरूप ही कृष्ण कुशल शासक और जन-मानस प्रेमी बने। बृषभ लग्न हो और उसमे चन्द्रमा विराजमान हो तब व्यक्ति जनप्रिय नेता अथवा प्रशासक होता है।

    कुंडली के सभी ग्रह ‘वीणा योग’ बना रहे हैं। कृष्ण गीत, नृत्य, संगीत में प्रवीण बने। कुंडली में ‘पर्वत योग’ इन्हें यशस्वी बना रहा है। बुध ने पंचम विद्या भाव में इन्हें कूटनीतिज्ञ विद्वान बनाया तो मकर राशिगत उच्च का मंगल ‘यशस्वी योग’ बनाकर इन्हें पूजनीय बनाया।

    वहीं सूर्य से एकादश भाव में चंद्र होने से ‘भास्कर योग’ का निर्माण हो रहा है, यह योग किसी भी जातक को पराक्रमी, वेदांती, धीर और समर्थ बनाता है।
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    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत-पूजन कैसे करें..?????

    श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी का सफल पूजन करने से मनुष्य का कल्याण होता ही है. भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्द्धरात्रि में हुआ था इसलिए इस दिन सुबह से लेकर रात्रि तक श्रीकृष्ण भक्ति में हर कोई डूब जाता है. इसी पवित्र तिथि पर बताई जा रही है भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित व्रत और पूजा की सरलतम विधि. आप भी भगवान की पूजा करें और ध्यान करें.

    सबसे पहले सुबह स्नान करने के बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर में मुख कर श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प करें. फिर अक्षत यानी पूरे चावल के दाने पर कलश स्थापना कर माता देवकी और श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. इनकी यथा विधि से पूजा करें या योग्य ब्राह्मण से कराएं. पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम उच्चारण करना चाहिए. अंत में माता देवकी को अर्ध्य दें, भगवान श्री कृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें. रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के बाल रुप प्रतिमा की पूजा करें. रात में श्रीकृष्ण स्तोत्र, गीता का पाठ करें. दूसरे दिन स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें. इस दौरान आप इस मंत्र का जाप जब भी समय मिले करते रहें “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:’’.

    उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-

    ममखिलपापप्रशमनपू- ्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
    श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

    अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए। फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-

    'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
    वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
    सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।'

    अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें।
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    ये है दो मत, इसलिए अलग मनता है पर्व-----

    स्मार्त मत------

    अष्टमी तिथि मध्यरात्रि में होने से उत्सव मनाया जाता है। गोपाल मंदिर में इसी मत से जन्माष्टमी मनाई जाती है।

    वैष्णव मत----

    उदयकालीन तिथि अष्टमी होने पर जन्माष्टमी मनाई जाती है। शहर में ज्यादातर वैष्णव मतावलंबी हैं। खजूरी बाजार के यशोदा मंदिर सहित शहरभर में इसी मत से पर्व मनाया जाता है।
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    श्रीकृष्ण के प्रभावी मंत्र दिलाते हैं सुख-सौभाग्य----

    भगवन श्रीकृष्ण के अनेक मन्त्र aise हें jinke dvara sukh -वैभव-समृद्धि प्राप्त की जा सकती हैं। इन मंत्रों के जाप से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शुभ प्रभाव बढ़ाने व सुख प्रदान करने में ये मंत्र अत्यन्त प्रभावी माने जाते हैं। आपकी सुविधा के लिए हमने मंत्र से संबंधित जानकारी भी यहां दी है।

    भगवान श्रीकृष्ण का मूलमंत्र :

    'कृं कृष्णाय नमः'

    - यह श्रीकृष्ण का मूलमंत्र है। इस मूलमंत्र का जाप अपना सुख चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को प्रातःकाल नित्यक्रिया व स्नानादि के पश्चात एक सौ आठ बार करना चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य सभी बाधाओं एवं कष्टों से सदैव मुक्त रहते हैं।
    सप्तदशाक्षर श्रीकृष्णमहामंत्- :

    'ऊ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा'

    यह श्रीकृष्ण का सप्तदशाक्षर महामंत्र है। इस मंत्र का पांच लाख जाप करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। जप के समय हवन का दशांश अभिषेक का दशांश तर्पण तथा तर्पण का दशांश मार्जन करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। जिस व्यक्ति को यह मंत्र सिद्ध हो जाता है उसे सबकुछ प्राप्त हो जाता है।
    सात अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'गोवल्लभाय स्वाहा'

    इस सात (7) अक्षरों वाले श्रीकृष्ण मंत्र का जाप जो भी साधक करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
    आठ अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'गोकुल नाथाय नमः'

    इस आठ (8) अक्षरों वाले श्रीकृष्ण मंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसकी सभी इच्छाएं व अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं।
    दशाक्षर श्रीकृष्ण मंत्र :

    'क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः'

    यह दशाक्षर (10) मंत्र श्रीकृष्ण का है। इसका जो भी साधक जाप करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
    द्वादशाक्षर श्रीकृष्ण मंत्र :

    'ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय'

    इस कृष्ण द्वादशाक्षर (12) मंत्र का जो भी साधक जाप करता है, उसे सबकुछ प्राप्त हो जाता है।
    बाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविंदाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह्‌सों।'

    यह बाईस (22) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसे वागीशत्व की प्राप्ति होती है।
    तेईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री'

    यह तेईस (23) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसकी सभी बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
    अट्ठाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'

    यह अट्ठाईस (28) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसको समस्त अभिष्ट वस्तुएं प्राप्त होती हैं।
    उन्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्- ण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा।'

    यह उन्तीस (29) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र है। इस श्रीकृष्ण मंत्र का जो भी साधक एक लाख जप और घी, शकर तथा शहद में तिल व अक्षत को मिलाकर होम करते हैं, उन्हें स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
    बत्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'नन्दपुत्राय श्यामलांगाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।'

    यह बत्तीस (32) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र है। इस श्रीकृष्ण मंत्र का जो भी साधक एक लाख बार जाप करता है तथा पायस, दुग्ध व शक्कर से निर्मित खीर द्वारा दशांश हवन करता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
    तैंतीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :

    'ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥'

    यह तैंतीस (33) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र है। इस श्रीकृष्ण मंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसे समस्त प्रकार की विद्याएं निःसंदेह प्राप्त होती हैं।

  • शारदीय नवरात्री 2013 , जान

    शारदीय नवरात्री 2013 , जानें कब और कैसे करें पूजा माँ दुर्गा की...??

    इस वर्ष 2013 के शारदीय नवरात्रे 5 अक्टूबर(शनिवार), आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होगें. इस दिन हस्त नक्षत्र, ऎन्द्र योग होगा. सूर्य और चन्द्र दोनों कन्या राशि में होंगे।

    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार ‘महाशक्ति’ की उपासना का पर्व नवरात्री 05 अक्टूबर (शनिवार) से आरम्भ होगा । नवरात्री पर्व में मां दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है।

    आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्यौहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो जाता है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में मां भगवती के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा की जाती है। यह महापर्व सम्पूर्ण भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इन दिनों भक्तों को प्रातः काल स्नानादि क्रियाओं से निवृत्त होकर निष्कामपरक संकल्प कर पूजा स्थान को गोमय से लीपकर पवित्र कर लेना चाहिए और फिर षोडशोपचार विधि से माता के स्वरूपों की पूजा करना चाहिए। पूजा करने के उपरान्त इस मंत्र द्वारा माता की प्रार्थना करना चाहिए-
    विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमांश्रियम्द्य रूपंदेहि जयंदेहि यशोदेहि द्विषोजहिद्यद्य
    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार नवरात्र माता की उपासना करने का विशेष समय होता है। इन नौ दिनों में सभी तन-मन से माता की आराधना करते हैं। इस त्योहार की शुरुआत अश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से होता है

    आश्विन के नवरात्री पर्व को ‘शारदीय नवरात्र’ कहा जाता है। नौ दिनों तक लोग प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के साथ निराहार या अल्पाहार व्रत का संकल्प पालन करते हैं। दुर्गा पूजा के नौ दिन तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक क्रिया-कलाप पूर्ण किए जाते हैं।

    नवरात्री व्रत पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। यह हिन्दू धर्म को मानने वालों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इसे शक्ति संचय का पर्व भी कहा जाता है। प्राकर्तिक रूप से ऋतुओं का संधि-काल माना जाता है। इन दिनों बाहरी तापमान भी लगभग शारीरिक तपमान के जितना ही रहता है।

    प्राचीनकाल से मान्यता है की यह समय प्रकृति के नजदीक रहकर उसके असर को शरीर पर सूक्ष्मता से अनुभव करने के लिए उचित है। अधिक भोजन या गरिष्ठ भोज्य से आलस्य और उन्माद की अधिकता के कारन इस अनुभव में बाधा आती है। इसलिए इन दिनों व्रत का विधान बनाया गया है।

    व्रत संकल्प का पालन करने वाले ब्रह्मचर्य धर्म भी निभाते हैं और सामान्यतया सादा जीवन व्यतीत करते हुए जमीन पर सोते हैं। भगवान राम ने भी लंकापति रावण पर विजय की प्राप्ति के लिए मां दुर्गा की उपासना की थी। श्री राम के अतिरिक्त भी अनेक पौराणिक कथाओं में आद्य शक्ति की आराधना का महत्त्व बताया गया है।

    घट स्थापना के शुभ मुहूर्त (शारदीय नवरात्री,2013 के लिए)---

    यह शारदीय नवरात्री पर्व संपूर्ण भारत में विशेषकर पूर्वी और उत्तरी भारत में आस्था और उत्साह से मनाया जाता है।
    ---घट स्थापना पूरे आस्था, विश्वास और संकल्प के साथ 05 अक्टूबर 2013, शनिवार (अश्विन शुक्ल प्रतिपदा) को श्रेष्ठ समय सुबह 08 बजकर 05 मिनट से प्रातः 09 बजे तक रहेगा...
    ---तदुपरांत दोपहर 12 बजकर 03 मिनट से दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक बीच करना उत्तम/शुभ रहेगा।
    ----इस दिन यदि चोघडिये के अनुसार घट स्थापना करना चाहे तो शुभ का चोघडिया प्रातः 07 बजकर 51 मिनट से सुबह 09 बजकर 19 मिनट तक रहेगा....

    स्थिर लग्न में स्थापना करें----
    ---यदि आप चाहें तो स्थिर लग्न वृश्चिक में प्रातः 09 बजकर 35 मिनट से सुबह 11 बजकर 50 मिनट तक भी घट स्थापना कर सकते हें...

    ===राहुकाल में स्थापना न करें---
    ---ज्योतिष के अनुसार राहुकाल को अशुभ समय माना जाता है एवं ऐसा माना जाता है कि इस काल में किया हुआ कार्य अशुभ फल देता है।
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    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार भारतीय संस्कृति में आराधना और साधना करने के लिए नवरात्र पर्व को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जहां अन्य त्योहार होली, दीवाली, ग्रहण आदि में समय बहुत कम होता है, वहीं नवरात्र अपेक्षाकृत दीर्घकालिक होते हैं।

    मूर्ति या तस्वीर स्थापनाः--
    माँ दुगा की मूर्ती या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र(अपनी सुविधानुसार) के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली अक्षत(बिना टूटा हुआ चावल), धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।

    आसनः-
    लाल अथवा सफेद आसन पूरब की ओर बैठकर नवरात्रि करने वाले विशेष को पूजा, मंत्र जप, हवन एवं अनुष्ठान करना चाहिए।
    कुलदेवी का पूजनः-
    हर परिवार में मान्यता अनुसार जो भी कुलदेवी है उनका श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा अर्चना करना चाहिए।

    देवी दुर्गा जी की पूजा प्राचीन काल से ही चली आ रही है, अनेक पौराणिक कथाओं में शक्ति की अराधना का महत्व व्यक्त किया गया है. नौ दिनों तक चलने नवरात्र पर्व में माँ दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है. नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक किर्या कलाप संपन्न किए जाते हैं.

    देवी पूजा में इनका रखे ध्यानः-
    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार इन नवरात्रों में रखें की कोई असावधानी न हो, दुर्गा पूजा करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है जैसे एक घर में दुर्गा की तीन मूर्तियां न हों अर्थात देवी की तीन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा, पूजन न करें। देवी के स्थान पर वंशवाध, शहनाई का घोष नहीं करना चाहिए तथा दुर्गा पूजन में दूर्वा अर्थात दूब का प्रयोग नहीं करना चाहिए। दुर्गा आवाहन के समय बिल्वपत्र, बिल्व शाखा, त्रिशूल, श्रीफल का प्रयोग करना चाहिए। पूजन में सुगंधहीन व विषैले फूल न चढ़ाए बल्कि लाल फूल मां को प्रिय हैं। रात्रि में कलश स्थापना नही करनी चाहिए। मां दुर्गा को लाल वस्त्र पहनाए और उनका मुख उत्तर दिशा की तरफ कदापि न करें। विभिन्न लग्न, मुहूर्ताे में मंत्र जाप और उपासना का विशिष्ट फल मिलता है जैसे मेष, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, मकर, कुम्भ में एश्वर्य, धन लाभ, स्वर्ण प्राप्ति और सिद्धि मिलती है। परंतु वृष, मिथुन, सिंह, धनू, मीन लग्न में अपमान, मृत्यु, धन नाश और दुखों की प्राप्ति होती है।
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    नवरात्रि पूजन विधि----

    नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ भगवती के एक स्वरुप श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह क्रम आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को प्रातकाल शुरू होता है। प्रतिदिन जल्दी स्नान करके माँ भगवती का ध्यान तथा पूजन करना चाहिए। सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

    कलश / घट स्थापना विधि -----

    सामग्री: ---
    जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र,
    जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी,
    पात्र में बोने के लिए जौ ,
    घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश,
    कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल,
    मोली/कलेवा/हाथ पर रक्षा बंधन हेतु,
    इत्र,
    साबुत सुपारी,
    कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के ,
    अशोक या आम के 5 पत्ते,
    कलश ढकने के लिए ढक्कन,
    ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल,
    पानी वाला नारियल,
    नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा,
    फूल माला,

    यह हें घट स्थापना की विधि ------
    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है. व्रत का संकल्प लेने के पश्चात ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है. कलश की स्थापना के साथ ही माता का पूजन आरंभ हो जाता है ..नवरात्र का श्रीगणेश शुक्ल पतिपदा को प्रातरूकाल के शुभमहूर्त में घट स्थापना से होता है।
    घट स्थापना हेतु मिट्टी अथवा साधना के अनुकूल धातु का कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर कर कलश के ऊपर नारियल को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कर अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्तो सहित रखना चाहिए।

    पवित्र मिट्टी में जौ के दाने तथा जल मिलाकर वेदिका का निर्माण के पश्चात उसके उपर कलश स्थापित करें। स्थापित घट पर वरूण देव का आह्वान कर पूजन सम्पन्न करना चाहिए।

    सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब एक परत जौ की बिछाएं। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब फिर एक परत जौ की बिछाएं। जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें। अब कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में साबुत सुपारी डालें। कलश में थोडा सा इत्र दाल दें। कलश में कुछ सिक्के रख दें। कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें। ढक्कन में चावल भर दें। नारियल पर लाल कपडा लपेट कर मोली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें। अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें। अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें। "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें। कलश को इत्र समर्पित करें।

    कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है।

    नवरात्री के प्रथम दिन एक लकड़ी की चौकी की स्थापना करनी चाहिए। इसको गंगाजल से पवित्र करके इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछाना चाहिए। इसको कलश के दायीं और रखना चाहिए। उसके बाद माँ भगवती की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा का फ्रेम किया हुआ फोटो स्थापित करना चाहिए। माँ दुर्गा को लाल चुनरी उड़ानी चाहिए। माँ दुर्गा से प्रार्थना करें "हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी में विराजिये।" उसके बाद सबसे पहले माँ को दीपक दिखाइए। उसके बाद धूप, फूलमाला, इत्र समर्पित करें। फल, मिठाई अर्पित करें।

    ----नवरात्रि में नौ दिन मां भगवती का व्रत रखने का तथा प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विशेष महत्व है। हर एक मनोकामना पूरी हो जाती है। सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है।

    -----नवरात्री के प्रथम दिन ही अखंड ज्योत जलाई जाती है जो नौ दिन तक जलती रहती है। दीपक के नीचे "चावल" रखने से माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा "सप्तधान्य" रखने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते है

    ---माता की पूजा "लाल रंग के कम्बल" के आसन पर बैठकर करना उत्तम माना गया है

    ----नवरात्रि के प्रतिदिन माता रानी को फूलों का हार चढ़ाना चाहिए। प्रतिदिन घी का दीपक (माता के पूजन हेतु सोने, चाँदी, कांसे के दीपक का उपयोग उत्तम होता है) जलाकर माँ भगवती को मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। मान भगवती को इत्र/अत्तर विशेष प्रिय है।

    ----नवरात्री के प्रतिदिन कंडे की धूनी जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा जरूर अर्पित करना चाहिए।

    ----लक्ष्मी प्राप्ति के लिए नवरात्र मैं पान मैं गुलाब की ७ पंखुरियां रखें तथा मां भगवती को अर्पित कर दें

    ---मां दुर्गा को प्रतिदिन विशेष भोग लगाया जाता है। किस दिन किस चीज़ का भोग लगाना है ये हम विस्तार में आगे बताएँगे।

    ---प्रतिदिन कन्याओं का विशेष पूजन किया जाता है। किस दिन क्या सामग्री गिफ्ट देनी चाहिए ये भी आगे बताएँगे।

    ----प्रतिदिन कुछ प्रभावी सिद्ध मन्त्रों का पाठ/जप/स्मरण भी करना चाहिए। जेसे----

    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार
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    ===सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।
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    ===ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।
    ---------------------------------
    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
    या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
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    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
    पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
    सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
    उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्म्रणव महात्मना।।
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    इन बातों का धयान रखें मन्त्र सिद्धि के समय (आवश्यक जानकारी )---

    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार इस नवरात्र के अंतराल में मन्त्र एवं यंत्र की सिद्धि का बहुत माहात्म्य बताया गया है–

    दुर्लभं वान्छादायकम सर्व सिद्धिप्रदम खलु। पंचायतनम यन्त्रं मंत्रम शारदे कृत नारदः।

    अर्थात शारदीय नवरात्र के अंतराल में सिद्ध किये गए यंत्र एवं मन्त्र हे नारद ! सर्व कामनाओं को पूरा करने वाले होते है। किन्तु यह तो एक सामान्य बात हो गयी। “ज्योत्षना शाकम्भरी” में यह स्पष्ट किया गया है की जिनका जन्म अनुराधा, मघा, अश्विनी, चित्रा, तीनो पूर्वा एवं तीनो उत्तरा में हुआ हो उनको पूजा का फल तो मिल सकता है, किन्तु यंत्र-मन्त्र सिद्ध नहीं हो सकते। इसी बात का संक्षेप एवं विस्तार से कई ग्रंथो में विवरण मिलता है।
    खैर जो भी हो, मैं सब श्रद्धालुओं से यही अपेक्षा करूंगा की इस परम पावन एवं देव दुर्लभ नवरात्र का भरपूर लाभ उठायें। तथा शाकम्भरी, कात्यायनी, शाबर, डामर, भैरव, लुब्धक, कंटक एवं दुर्गा यंत्र तथा माहेश्वरी, विपाशा, अरुंधती, कीलक, कवच आदि मंत्रो की सिद्धि का अवश्य प्रयत्न करें।
    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार यंत्र की सिद्धि के पूर्व यह अवश्य सुनिश्चित कर लें की वह शुद्ध बना हो, आप की जन्म नक्षत्र के भुक्त अंशो के परिमाण का हो, तथा छह माह से ज्यादा पुराना बना न हो।
    मंत्रो के बारे में यह सुनिश्चित कर लें कि आप उसका सस्वर शुद्ध उच्चारण कर लेगें। जिस मन्त्र के सस्वर एवं शुद्ध उच्चारण के प्रति आप आश्वस्त हो, उन्हें ही सिद्ध करें। अन्यथा आप का धन, समय एवं प्रयत्न सब विफल होगा। उदाहरण के लिए स्वरों (अ, आ से लेकर औ तक के वर्ण) के ऊपर आने वाली बिंदियों का उच्चारण “म” नहीं बल्कि अँ” के रूप में करें। जैसे ऐं” का उच्चारण “ऐम” के रूप में नहीं बल्कि “न्ग” के रूप में करें।
    यदि पहले से कोई सिद्ध यंत्र या अंगूठी आप धारण कर रखें हो तो इस नवरात्र में उसका पुनः जागृतिकरण कर लें।
    और सबसे महत्व पूर्ण बात यह कि सामग्री एवं ब्राह्मण की मज़दूरी (दक्षिणा को आज मज़दूरी कहना मज़बूरी है) में कोई कमी न करें। यदि आप को लगता है की इस काम में ज्यादा धन खर्च होगा, तो कृपया यंत्र-मन्त्र की सिद्धि के झमेले में न पड़ें। और दबाव में या किसी लोभ में यह काम न करें। सीधे अपनी इच्छा के अनुरूप पूजा का समापन कर लें।
    यदि किसी कारण से इस दौरान यंत्र धारण न कर सकते हो, तो सिरे से इस काम को स्थगित कर दें।
    वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में महंगाई के मद्दे नज़र यंत्रो की सिद्धि अब गरीब लोगो के बस की बात नहीं रह गयी है। उन्हें माता जी की पूजा एवं अराधना से ही संतुष्ट होना चाहिए।ये नौ दिन बड़े ही उत्कट प्रभाव देने वाले होते है। समस्त ग्रहों के समक्ष एकाएक धरती का एक विशिष्ट भाग प्रकट होता है। और इसीलिए इन नौ दिनों में की गयी साधना अमोघ एवं अचूक फल देने वाली हो जाती है।
    जैसा की मैं पहले ही बता चुका हूँ। की माता जी की पूजा तो किसी भी दिन करें, किन्तु इस नवरात्र के दौरान इसकी अनुकूलता का अलग लाभ उठायें।
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    शारदीय नवरात्र आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक इनका रंग दिन प दिन चढ़ता जाता है और नवमी के आते आते पर्व का उत्साह अपने चरम पर होते हैं.

    ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री(मोब।--09024390067- ) के अनुसार दुर्गा अष्टमी तथा नवमी के दिन मां दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्यों को भोजन कराया जाता है. शक्ति पूजा का यह समय, कन्याओं के रुप में शक्ति की पूजा को अभिव्यक्त करता है.आदिशक्ति की इस पूजा का उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है. श्री राम द्वारा किया गया शक्ति पूजन तथा मार्कण्डेय पुराण अनुसार स्वयं मां ने इस समय शक्ति पूजा के महत्व को प्रदर्शित किया है.

    आश्विन माह की नवरात्र में रामलीला, रामायण, भागवत पाठ, अखंड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान देखे जा सकते हैं नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, जीव को सदगति प्रदान करने वाली होती है तथा जीव समस्त बंधनों एवं कठिनाईयों से पार पाने कि शक्ति प्राप्त करने में सफल होता है.
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    इस नवरात्रि करें अपनी राशि अनुसार पूजन---

    इन नवरात्री के नौ दिन में इस प्रकार करें अपनी जन्म/नाम राशी अनुसार पूजन विधि-विधान से ------

    ---इन नौ दिनों में मेष व वृश्चिक राशि व लग्न वाले लाल पुष्पों को अर्पित कर लाल चंदन की माला से मंत्रों का जाप करें। नैवेद्य में गुड़, लाल रंग की मिठाई चढ़ा सकते है। नवार्ण मंत्र इनके लिए लाभदायी रहेगा।

    ---- वृषभ व तुला राशि व लग्न वाले सफेद चंदन या स्फटिक की माला से कोई भी दुर्गा जी का मंत्र जप कर नैवेद्य में सफेद बर्फी या मिश्री का भोग लगा सकते हैं।

    ---- मिथुन व कन्या राशि व लग्न वाले तुलसी की माला से जप कर गायत्री दुर्गा मंत्रों का जाप कर सकते हैं। नैवेद्य में खीर का भोग लगाएं।

    ----- कर्क राशि व लग्न वाले सफेद चंदन या स्फटिक की माला से जप कर नैवेद्य में दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।

    ---- सिंह राशि व लग्न वाले गुलाबी रत्न से बनी माला का प्रयोग व नैवेद्य में कोई भी मिठाई अर्पण कर सकते हैं।

    ----धनु व मीन राशि व लग्न वालों के लिए हल्दी की माला से बगुलामुखी या दुर्गा जी का कोई भी मंत्र से जप ध्यान कर लाभ पा सकते है। नैवेद्य हेतु पीली मिठाई व केले चढ़ाएं।

    ---- मकर व कुंभ राशि व लग्न वाले नीले पुष्प व नीलमणि की माला से जाप कर नैवेद्य में उड़द से बनी मिठाई या हलवा चढ़ाएं।

    वैसे देवी किसी चढ़ावा या किसी विशेष पूजन-अर्चन से ही प्रसन्न होंगी, ऐसी बात नहीं है, बल्कि शुद्ध चित्त-मन श्रद्धा-भक्ति से किए गए पूजन से देवी प्रसन्न होती हैं।

  • कुछ मुक्तक...आपकी नज़र..

    कुछ मुक्तक...आपकी नज़र.....

    (१) कुछ रिश्ते अनजाने में हो जाते हैं !
    पहले दिल फिर जिंदगी से जुर जाते हैं !!
    कहते हैं उस दौर को दोस्ती....!
    जिसमे लोग जिंदगी से भी प्यारे हो जाते हैं !!

    (२) समझ सका न कोई मेरे दिल को !
    ये दिल यूँ ही नादान रह गया !!
    मुझे कोई गम नहीं इस बात का !
    अफसोस हैं की मेरा यार भी मुझसे अंजान रह गया !!

    (३) उसको चाहते रहेंगे यूँ उम्र गुजर जायेगी !
    मौत आएगी और जिंदगी ले जायेगी !!
    मेरे मरने पे भी मेरे सनम को रोने न देना !
    उसको रोते देख मेरी रूह तड़प जायेगी !!

    (४) प्यास ऐसी की पी जाऊ आँखे तेरी !
    नसीब ऐसा की हासिल जहर भी नहीं !!
    बे ग़र्ज वफाए कोई हमसे पूछे...!
    जिसे टूट के चाहा उसे खबर भी नहीं !!

    (५) अब भी ताज़ा हैं जख्म सिने में !
    बिन तेरे क्या रखा हैं जीने में...!!
    हम तो जिन्दा हैं तेरा साथ पाने को !
    वर्ना देर नहीं लगती हैं जहर मिने में !!

    ====पंडित दयानंद शास्त्री"विशाल"=====
    मोब. -09024390067 ...

  • कुछ मुक्तक...आपकी नज़र..

    कुछ मुक्तक...आपकी नज़र.....

    (१) कुछ रिश्ते अनजाने में हो जाते हैं !
    पहले दिल फिर जिंदगी से जुर जाते हैं !!
    कहते हैं उस दौर को दोस्ती....!
    जिसमे लोग जिंदगी से भी प्यारे हो जाते हैं !!

    (२) समझ सका न कोई मेरे दिल को !
    ये दिल यूँ ही नादान रह गया !!
    मुझे कोई गम नहीं इस बात का !
    अफसोस हैं की मेरा यार भी मुझसे अंजान रह गया !!

    (३) उसको चाहते रहेंगे यूँ उम्र गुजर जायेगी !
    मौत आएगी और जिंदगी ले जायेगी !!
    मेरे मरने पे भी मेरे सनम को रोने न देना !
    उसको रोते देख मेरी रूह तड़प जायेगी !!

    (४) प्यास ऐसी की पी जाऊ आँखे तेरी !
    नसीब ऐसा की हासिल जहर भी नहीं !!
    बे ग़र्ज वफाए कोई हमसे पूछे...!
    जिसे टूट के चाहा उसे खबर भी नहीं !!

    (५) अब भी ताज़ा हैं जख्म सिने में !
    बिन तेरे क्या रखा हैं जीने में...!!
    हम तो जिन्दा हैं तेरा साथ पाने को !
    वर्ना देर नहीं लगती हैं जहर मिने में !!

    ====पंडित दयानंद शास्त्री"विशाल"=====
    मोब. -09024390067 ...

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